देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध उत्तराखंड की भूमि पर एक बड़ी प्राकृतिक आपदा की आशंका है। दरअसल केदारनाथ धाम के पास नौ दिनों में तीन बार हिमस्खलन हो चुका है। इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिक इसके कारणों की तलाश कर रहे हैं।
जब पहाड़ों की चोटी पर जमा बर्फ तेजी से खिसकने और गिरने लगता है तो इसे हिमस्खलन कहते हैं। केदारनाथ में पिछले शनिवार को हिमस्खलन हुआ था। केदारनाथ धाम से करीब सात किलोमीटर दूर एक पहाड़ से हजारों टन बर्फ गिरी थी। साथ ही 22 सितंबर को केदारनाथ से पांच किलोमीटर ऊपर चौराबारी ताल के पास ग्लेशियर के जलग्रहण क्षेत्र में हिमस्खलन हुआ था।
अलर्ट पर कई टीमें-
कहा जा रहा है कि इस हिमस्खलन में जानमाल का नुकसान नहीं हुआ है लेकिन स्थानीय लोग डरे हुए हैं। सुरक्षा की दृष्टि से प्रशासन ने स्थानीय लोगों को सतर्क रहने को कहा है और एनडीआरएफ को भी अलर्ट कर दिया है।
केदारनाथ धाम के पास लगातार हिमस्खलन से वैज्ञानिक भी सतर्क हो गए हैं। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी एंड रिमोट सेंसिंग इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक चौराबरी ग्लेशियर पर शोध के लिए चौराबरी पहुंचे हैं। 2013 में चोराबाड़ी ग्लेशियर ने केदारनाथ धाम को तबाह कर दिया था। उस तबाही को याद करके आज भी शरीर कांप उठता है।
2013 में क्या हुआ था?
2013 में 13 से 17 जून के बीच लगातार बारिश हो रही थी। इससे चोराबाड़ी ग्लेशियर पिघल गया, जिससे मंदाकिनी नदी ऊपर उठ गई। जिससे नदी की बाढ़ एक आपदा साबित हुई। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पश्चिमी नेपाल के कुछ हिस्से भी इसकी चपेट में आ गए। इसके कारण भूस्खलन भी हुआ। कई भारी पत्थरों ने बाढ़ में बहकर कहर बरपाया।
केदारनाथ धाम में आई बाढ़ में करीब 5000 लोगों की मौत हो गई थी। डेढ़ सौ से अधिक पुल बह गए थे। सैकड़ों किलोमीटर सड़क क्षतिग्रस्त हो गई। जानकारी के अनुसार, 13 हजार हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि को नुकसान पहुंचा है, नौ राष्ट्रीय राजमार्ग, 35 राज्य राजमार्ग, 2385 सड़कें, 86 वाहन पुल और 172 छोटे पुल बह गए हैं या क्षतिग्रस्त हो गए हैं।लोगों को इस त्रासदी से उबरने का भी मौका अब तक नहीं मिला।