भोपाल: मप्र सरकार द्वारा पौधारोपण को लेकर करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं. इसके बाद भी जंगल घट रहा है. ऐसा तब है जब हर साल वन विभाग हर साल 4 से 5 करोड पौधों का रोपण किया जाता है जिस पर तीन सौ से चार सौ करोड़ का खर्च होता है. बावजूद इसके, एफएसआई-21 की रिपोर्ट के अनुसार राज्य के 38 जिले ऐसे हैं जहां पर डेंसिटी फॉरेस्ट कवर एरिया घटा है.
इसमें मुख्यमंत्री का गृह जिला सीहोर और वन मंत्री का गृह जिला खंडवा भी शामिल है. सबसे अधिक एरिया बड़वानी, हरदा, सिंगरौली, शहडोल, जबलपुर, श्योपुर और जबलपुर जिला शामिल है. राजधानी भोपाल में भी फॉरेस्ट कवर एरिया कम हुआ है. जिन जिलों में फॉरेस्ट कवर एरिया कम हुआ है, वहां किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए.
एफएसआई-21 की रिपोर्ट ने जंगल महकमे ऊंचे पदों पर बैठे आसीन अफसरों की कलाई खोल दी है कि वे प्रदेश में अवैध उत्खनन और अतिक्रमण को रोकने में असफल रहे हैं. अवैध उत्खनन और अतिक्रमण के चलते ही प्रदेश के जंगल का इतना बड़ा इलाका 5457 वर्ग किलोमीटर वृक्ष विहीन हो गया है. यहां यह उल्लेख करना उचित होगा कि प्रदेश में हर साल अवैध उत्खनन और अतिक्रमण के 60,000 से अधिक मामले दर्ज होते हैं.
वर्ष 2019-20 में मध्यम घना जंगल 34341 वर्ग किमी था, जो वर्ष 2021-22 में घटकर 34209 वर्ग किमी रह गया. यही नहीं, बहुत घने जंगल का रकबा भी दो किमी घटा ही है. वर्ष 2019-20 में ये आंकड़ा 6667 वर्ग किमी था, जो वर्ष 2021-22 में घटकर 6665 वर्ग किमी पर आ गया. दूसरी तरफ, वर्ष 2019 में ओपन फॉरेस्ट का दायरा 36465 वर्ग किमी था, जो वर्ष 2021-22 में बढ़कर 36618 वर्ग किमी हो गया है. रिपोर्ट के मुताबिक ओपन फॉरेस्ट का दायरा 153 वर्ग किमी तक बढ़ गया है.
बटरफ्लाई और रेप्टाई का भी एरिया का हुआ कम-
एफएसआई की रिपोर्ट ने एक और चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए हैं. वन विभाग एक तरफ राज्य में बटरफ्लाई का सर्वे करा रहा है और दूसरी तरफ उनका रहवास एरिया कम होता जा रहा है. रिपोर्ट के अनुसार बटरफ्लाई, रेप्टाइ, चिड़िया और कीट-पतंगों का 55000 हेक्टयर जंगल कम हो गया. यहीं पोलिनेटर रहते हैं. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यदि बटरफ्लाई एरिया कम हो रहा है तो इसका असर आसपास के खेत और बगीचों के उत्पादन पर पड़ेगा. इसके अलावा कृषि वानिकी और विस्तार वानिकी का 28500 हेक्टयर एरिया भी कम हुए हैं.
करोड़ों खर्च पर घट रहा है जंगल-
रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2009-10 में राज्य में अति सघन, सघन और खुला वनक्षेत्र 77700 वर्ग किमी था, जो वर्ष 2021-22 में घटकर 77493 वर्ग किमी रह गया है. यानी 12 साल में 207 वर्ग किमी जंगल घट गया. ऐसा तब है, जब हर साल 4 करोड़ से 5 करोड़ पौधारोपण होने का दावा किया जाता है.
पौधारोपण पर वन विभाग के अफसर हर वर्ष 300 करोड़ से 400 करोड़ रुपए खर्च करते हैं. साल 2021-22 में अकेले पौधारोपण पर 350.96 करोड़ रुपए खर्च हुए। वहीं इनके संरक्षण पर भी सरकार ने 17.98 करोड़ रुपए खर्च कर डाले. इसी तरह साल 2020-21 में पौधारोपण पर 348 करोड़ और संरक्षण पर 20.92 करोड़ रुपए खर्च हुए थे.