भोपाल: देश का ह्दय प्रदेश कहा जाने वाला मध्यप्रदेश अपने भीतर प्रचुर संभावनाएं लिए हुए है। यहां आईटी, उद्योग, फिल्म, रंगमंच  सैन्य और शिक्षा हर क्षेत्र में विकास और रोजगार के अवसर हैं। बस जरूरत इन्हें समझने और सही दिशा में कदम उठाने की है। 

कुछ इस तरह के विचार  कुशाभाऊ ठाकरे इंटरनेशनल कन्वेंशन हॉल में मप्र प्रेस क्लब के सालाना कार्यक्रम  ‘मप्र रत्न अलंकरण’  के दूसरे सत्र में हुए ‘संवाद सत्र’ में उभर कर आये। इस चरण में क्लब द्वारा सम्मानित विभूतियों  द्वारा ‘मप्र के विकास में हमारी सहभागिता’ विषय पर बातचीत की। तीन चरणों में हुए संवाद के पहले क्रम में प्रदेश में शिक्षा और रोजगार की संभवानाओं पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री आलोक मेहता ने कहा कि महाकाल की नगरी उज्जैन का आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व रहा है।

इस नगरी को शिक्षा के बड़े केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। इसे इस तरह तैयार किया जाये कि यहां बाहर से आकर पढऩे के लिए लोग लालायित हों। उन्होंने कहा कि कौशल विकास की दिशा में कार्य होने चाहिए। रोजगार से ज्यादा चिंता यह होना चाहिए कि वह अर्जित कितना कर रहा है। यह कौशल विकास से ही संभव है। उन्होंने कहा कि मप्र में बीते सालों में सडक़ों के निर्माण से लेकर अधोसंरचना के क्षेत्र में बहुतायत से काम हुआ है।

यह प्रगति के रास्ते खोलने वाले कदम माने जाएंगे। उन्होंने रक्षा क्षेत्र में बड़े कार्य करने के लिए प्रदेश को उपयुक्त स्थल बतलाया। उन्होंने इंदौर और ग्वालियर जैसे शहरों को आईटी के बड़े सेक्टर के रूप में विकसित किए जाने की योजना पर बल दिया। उनका मानना था कि सही तरह से कदम उठाये जायें तो हैदराबाद और बंगलरु हमारे यह शहर बन सकते हैं। 

इसी से सहमति जताते हुए दूूसरी सम्मानित विभूति एयर मार्शल प्रदीप पद्माकर बापट का मानना भी था कि प्रदेश पूरी तरह से सुरक्षित प्रदेश है। ह्दय प्रदेश होने से यहां पड़ोसी देशों की सीमा और समुद्रजनित या अन्य किसी प्रकार की आपदाओं की संभावना नहीं है। ऐसे में यहां सेना के उपकरणों के उद्योग लगाये जा सकते हैं।

उन्होंने इस बात पर भी दु:ख जताया कि प्रदेश के बच्चों का सेना की ओर रूझान कम है। उनमें यह पैदा किया जाना चाहिए। इसके लिए स्कूलों में एनसीसी आदि को अनिवार्य किया जाये। एअर मार्शल ने इस पर भी दु:ख जताया कि सेना से रिटायर होने के बाद उन्हें अच्छे रोजगार दिए जाने चाहिए। जिससे लोग इस ओर आकृष्ट होंगे। वरिष्ठ पत्रकार सुधीर सक्सेना का कहना था कि एक कलाकार,साहित्यकार या पत्रकार समाज को वही लौटाता है जो समाज से उसे मिला है।

उन्होंने पत्रकारिता की भाषा पर कहा कि इसमें ताकत और तमीज दोनों ही होना चाहिए तब हम अपनी बात लोगों तक पहुंचा पाएंगें। उन्होंने प्रदेश मेें निर्यात के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि रूस- यूक्रेन के बाद प्रदेश के उत्पादों की मांग बढ़ी है। इस सत्र का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पंकज पाठक ने किया। 

दूसरे सत्र में फिल्म और कला के क्षेत्र की संभावनाओं को लेकर चर्चा हुई। भोपाल से ही बावस्ता ख्यात फिल्म निर्देशक रूमी जाफरी ने कहा कि मप्र का सौंदर्य फिल्मकारों को लुभाता है। लेकिन यहां सुविधायें मिलें तो फिल्म उद्योग के लिए यह प्रदेश पूरी तरह से मुफीद है। यहां पर हैदराबाद या मुंबई की तरह फिल्म सिटी विकसित की जाये।

साथ ही शूटिंग की अनुमति तथा अन्य कानूनी पेचदगियों से बचने के तरीके ईजाद किये जायें जिससे फिल्म निर्माता आने में यहां सहजता महसूस करें। इससे प्रदेश की आमदनी बढ़ेगी और युवाओं को रोजगार भी मिलेगा। इस दौरान उन्होंने अपनी फिल्म ‘चेहरा’पर भी बात की। जबकि  लघुफिल्म निर्माता देवेन्द्र खंडेलवाल का मानना था कि लघु फिल्म निर्माण में यहां की सरकार थोड़ी कृपणता महसूस करती है।

करीब 250 से ज्यादा लघु फिल्म बनाकर वल्र्ड रिकॉर्ड कायम करने वाले देवेंद्र खंडेलवाल का सुझाव था कि सरकार अपनी मर्जी की लघुफिल्में ही बनाये। उनकी योजनाओं का प्रचार करती फिल्म बनाये इससे कई लोगों का रोजगार मिलेगा और इस तरफ आकृष्ट होंगे। सुप्रसिद्ध रंगकर्मी लोकेन्द्र त्रिवेदी का कहना था कि बच्चों को रंगमंच से जोडऩे के लिए स्कूलों में इस विधा को पढ़ाया जाये।

बल्कि स्थानीय स्तर पर वहां की बोलियों में इसे पढ़ाने की व्यवस्था हो। इससे रंगमंच की तरफ नई पीढ़ी आयेगी। उन्होंने भारत भवन के रंगमंडल को पुर्नजीवित किए जाने की जरूरत पर भी बल दिया। अपनी रंग यात्रा को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि उज्जैन में बचपन बीता। यहां रामलीला और माचा जैसी लोककलाओं ने इस दिशा में मोड़ दिया। उन्होंने अपनी सफलता में बव कारंत का बड़ा योगदान बतलाया। 

इस सत्र का संचालन प्रसिद्ध फिल्म पत्रकार विनोद नागर ने किया। अंतिम सत्र में प्रदेश में उद्योगों की संभावनाओं पर चर्चा हुई। उद्योगपति संजीव सरन ने कहा कि  सरकार उद्योग व्यापार में न लगकर  नए उद्योगों  की स्थापना  कैसे हो या स्थापित उद्योगों को बढ़ावा कैसे मिले इस तरफ सोचे। उद्योगों के लिए सुविधाएं बढ़ायें तो प्रदेश में और ज्यादा इंडस्ट्रियां लग सकती हैं। उन्होंने खासकर कपड़ा उद्योगों को बढ़ावा दिए जाने पर बल दिया। इस क्षेत्र में गुजरात की तरह यहां भी काम होना चाहिए। 

प्रदेश में आईटी सैक्टर में हुई प्रगति पर उन्होंने संतोष जताया। यह आत्मनिर्भर भारत के लिए जरूरी कदम है।  कथक नृत्यांगना टीना देवले तांबे का मानना था कि प्रदेश में कलाकारों की कमी नहीं है लेकिन उन्हें काम और अवसर नहीं मिल पाते इस वजह से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान नहीं मिल पाती।

उन्होंने नृत्य कला को स्कूल स्तर पर बढ़ावा देने की जरूरत बतलाई। उद्योगपति राजीव अग्रवाल का मानना था कि उद्योगों की स्थापना के लिए अधोसंरचना विकास पर ध्यान देना जरूरी है। उन्होंने ग्रामीण स्तरों पर उद्योग स्थापित करने की संभावना तलाशने का सुझाव दिया। वित्त सलाहकार प्रदीप करमबेलकर ने कहा कि उद्योगों को कॉलेजों से जुडऩा चाहिए।

जिससे नए बच्चों को लाभ मिलेगा तथा उद्योगों के नए-नए  सेक्टर के रास्ते खुलेंगे। उन्होंने स्टार्टअप के लिए सोशियो इकॉनामी व्यवस्था की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि प्रदेश के कुछ युवाओं ने स्टार्टअप के क्षेत्र में बड़े काम किए हैं। उनका सुझाव था कि बच्चे पढ़ाई के दौरान निवेश के क्षेत्र में आगे बढ़ें इससे पैसों का सही उपयोग और आय के अवसर मिलते हैं। इस सत्र का संचालन पत्रकार राजेंद्र शर्मा ने किया।