भोपाल।
कर्मचारी नेता से वायरल कराया वीडियो
रात भर भोपाल रेलवे स्टेशन पर घेर कर रखा गया तो नई पेंशन के लिए जुटने की चेतावनी दे चुके कर्मचारी नेताओं को पुलिस ने बुलाकर अपनी मौजूदगी में वीडियो बनाया और उसे वायरल किया गया। डांट-फटकार अलग लगाई गई। इन दोनों ही विरोध प्रदर्शनों के लिए पुलिस ने अनुमति नहीं दी थी। पुलिस के लिए रौद्र रूप को देखकर कर्मचारी नेता कन्नी काट रहे हैं। समस्याएं तो अभी भी लंबित है लेकिन आंदोलन की राह पर चलने के लिए कोई भी तैयार नहीं है। आम कर्मचारियों का कहना है कि नुकसान उनका हो रहा है। कर्मचारी नेता उनकी मांगों को पूरा नहीं करवा पा रहे हैं।
11 मार्च को कलियासोत मैदान में बड़ा आंदोलन बुलाया गया था। यह राष्ट्रीय पुरानी पेंशन बहाली संगठन के बैनरतले बुलाया गया था। इसके पहले वाट्सएप ग्रुपों पर मैसेज वायरल होने लगे कि एक लाख से अधिक लोग जुटेंगे। पुलिस हरकत में आई और दी गई अनुमति तीन दिन पहले ही निरस्त कर दी गई। एक कर्मचारी नेता को पुलिस ने बुलवाया और उनसे वीडियो बनवाया और कहलवाया कि उक्त आंदोलन को निरस्त किया जाता है इसलिए भोपाल न पहुंचे।
अभी तक कलेक्टर व संबंधित इलाके के एडीएम से आंदोलन की ले लेते थे आसानी से अनुमति पुलिस कमिश्नरी लागू होने के बाद आ रही मुश्किलें पहले कभी इस तरह नहीं की कार्रवाई 15 दिनों में यह हुआ l
आशा-उषा कार्यकर्ताओं को शहर के अंदर प्रवेश नहीं करने दिया, आशा - उषा कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया l
7 मार्च को आशा-उषा कार्यकर्ताओं ने राजधानी में बड़े आंदोलन की चेतावनी दी थी। विधानसभा कूच करने का ऐलान किया था। ये नियमित करने, वेतन बढ़ाने जैसी मुख्य मांगों को लेकर भोपाल पहुंच रही थी। इन्हें शहर के अंदर प्रवेश करने से पहले रोक लिया गया। कुछ को पुलिस अभिरक्षा में रखा गया। इन्हें लेकर पहुंचे वाहन मालिकों को साफ कह दिया गया कि वाहन जब्त कर लिए जाएंगे। ट्रेनों से पहुंचने वाली महिलाओं को स्टेशनों से बाहर नहीं निकलने दिया गया। इनके नेता बेबस नजर आएं। आखिरकार विश्व महिला दिवस की पूर्व संध्या पर हजारों महिलाएं परेशान होती रही।
कर्मचारियों का कहना है कि पूर्व में शासन ने इस तरह की कार्रवाई नहीं की थी। जब से पुलिस कमिश्नर व्यवस्था लागू हुई है तब से इस तरह परेशान किया जा रहा है। विरोध दर्ज कराने के अधिकारों को भी कुचला जा रहा है। यह ठीक तरीका नहीं है यदि पुलिस यही करती रही तो मजबूरन कोर्ट की शरण लेनी पड़ेगी। इतना ही नहीं, पुलिस के भय से स्थिति यहां तक पैदा हो गई कि अब कर्मचारी नेता खुलकर कुछ बोलने से भी बच रहे हैं।