हाल ही में पूरे देश ने आजादी का 75वां वर्ष बड़ी ही धूमधाम के साथ मनाया। आजादी के इस अमृत काल में भले ही दावा विश्व गुरु बनने की राह का हो लेकिन हालात यह है कि ग्रामीण भारत आज भी बुनियादी चीजों के लिए सिसकियां भरता हैं।

कई बार इन बुनियादी चीजों के अभाव में इस सरकारी तंत्र रूपी भगवान से आम जनता का विश्वास उठना लाजमी सा बन जाता है। राजधानी भोपाल से कुछ ही दुरी पर मौजूद बैरसिया तहसील से जो तस्वीर निकलकर सामने आई, उसने शिवराज सरकार के विकासरूपी दावों की पूरी पोल खोल दी। सरकारी सुविधा के अभाव में अंतिम संस्कार के लिए भी तरसती एक जिंदा कहानी के बारे में जानकर आप भी सोच में पड़ जायेंगे..!     

यह तस्वीर..! मध्यप्रदेश की बैरसिया तहसील के अंतर्गत आने वाली पोलासगंज कोटरा चोपड़ा पंचायत से निकलकर सामने आई है। यहां नन्नू लाल कुशवाहा की जिंदगी का पूरा सफ़र ग़रीबी के कारण बड़े ही संघर्ष के साथ गुज़रा। लेकिन सरकारी व्यवस्था की हालत यह है कि उसी ग़रीब व्यक्ति को जिंदगी के अंतिम सफ़र में भी दो गज़ ज़मीन भी नसीब न हो पाई।

बीते दिनों से प्रदेश में बारिश की ऐसी झड़ी लगी कि ग्रामीणों के लिए दाह संस्कार करने की स्थिति भी विकट हो गई। गांव में मुक्तिधाम नहीं होने के कारण मौजूदा हालात को समझते हुए ग्रामीणों ने लकड़ी की बल्लियों का एक शेड बनाया। बारिश की मोटी-मोटी बूंदों के बीच बड़ी मशक्कत से अंतिम क्रिया सम्भव हो सकीं।

इन हालातों के बीच अब आप चाहें तो आजादी का अमृत महोत्सव मनाये या फिर योजनाओं के नाम पर बड़े-बड़े मंच सजाएं लेकिन लगातार ग्रामीण अंचल से सामने आने वाली तस्वीरें तीखे सवालों के साथ ग्रामीण भारत की मौजूदा सच्चाई बयां कर रही हैं। 

सोचिए ज़रा..! राजधानी के पास के क्षेत्र में ही विकास का दावा दम तोड़ गया। तो फिर पूरे प्रदेश के क्या हालात होंगे? खैर जैसे तैसे नन्नूलाल का अंतिम संस्कार तो हो गया लेकिन बदहाल व्यवस्था पर उठे सवाल सरकारी तंत्र के खिलाफ़ हमेशा जीवित रहेंगे।