मुंबई और हरियाणा में कोविड-19 के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। दिल्ली में काफी संख्या में लोग पॉजिटिव पाए जा रहे हैं। इस मार्च के बाद पहली बार राजधानी में मरीजों की संख्या 200 से ऊपर पहुंची है। मुंबई में भी कोविड के नए मरीज मिले। हरियाणा में भी पॉजिटिव पाए गए। पहली नजर में इनकी संख्या कम लगती है, लेकिन आंकड़ों के हिसाब से दिल्ली में पॉजिटिविटी रेट 2.49 फीसदी है, जो पिछले तीन महीने का पीक है। एक अहम बात यह भी है कि अभी बहुत अधिक टेस्ट भी नहीं हो रहे जैसे दिले 12 हजार से अधिक रहे।
जैसे, में इसलिए मरीजों की असल संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। फिर भी इन आंकड़ों से इतना तो पक्का है कि सरकारी एजेंसियों और लोगों को सावधान हो जाना चाहिए। देश में चौथी लहर की आशंका पहले जताई जा चुकी है और अभी दुनिया के कई देशों में वायरस का संक्रमण काफी तेज है। ऐसे में कोविड प्रोटोकॉल, सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क लगाने को लेकर सचेत हो जाना चाहिए। दिल्ली ने तो जल्दबाजी करते हुए लोगों को मास्क के बंधन से ही आजाद करने का फरमान दे दिया था। हालांकि राहत की बात यह है कि हालिया मामलों में बहुत कम लोगों को अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत पड़ रही है। इसलिए लोगों को बहुत घबराने की जरूरत नहीं लेकिन यह बात है कि कोविड- वायरस के नए वेरिएंट आने का खतरा बना हुआ है। ऐसी स्थिति में वैक्सीन की प्रिकॉशन डोज बहुत कारगर साबित हो सकती है।
सरकार ने हाल में इसका दायरा बढ़ाया है, जिस पर पिछले रविवार से अमल शुरू हुआ। 18 साल से ऊपर के सभी लोग इसके लिए योग्य हैं, लेकिन अभी तक इस अभियान में तेजी नहीं आई है। इसके दो कारण हैं। पहला, दूसरी डोज के बाद 9 महीने का गैप प्रिकॉशन डोज के लिए अनिवार्य शर्त है। इसे घटाकर 6 महीने किया जाना चाहिए। असल में, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो भी शोध हुए हैं, उनसे पता चलता है कि डोज लगने के 6 महीने बाद इम्यूनिटी कमजोर पड़ने लगती है। नौ महीने के गैप के साथ 18-59 साल आयु वर्ग में 2.9 करोड़ लोग बूस्टर डोज के योग्य हैं, जबकि 6 महीने के गैप से यह संख्या बढ़कर 19.2 करोड़ हो जाएगी। दूसरी दिक्कत यह है कि अभी प्रिकॉशन डोज सिर्फ निजी टीका केंद्रों पर लगाए जा रहे हैं। इनकी कीमत भी
ज्यादातर भारतीय परिवारों के लिए अधिक है। इसलिए अगर इन्हें सरकारी केंद्रों में मुहैया कराया जाए तो उससे टीकाकरण के इस दौर का दायरा बढ़ाने में मदद मिलेगी। इसलिए इन दोनों बाधाओं को दूर किया जाए। मगर सबसे बड़ी जरूरत यह है सावधानी को नहीं छोड़ी जाये। क्योंकि पहली और दूसरी लहर में भी शुरूआती दौर में कम् मरीजों के आंकड़े देखकर सरकारें देर से जागी थीं और संक्रमण ने भयावह रूप ले लिया था।
आशीष दुबे