भोपाल: प्रदेश के पालपुर कूनो राष्ट्रीय उद्यान श्योपुर में नामीबिया से आठ चीता लाने के लिए नई दिल्ली में महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर हुआ. यह अनुबंध केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव और नामीबिया गणराज्य की उपराष्ट्रपति नांगलो मुंबा के बीच हुआ. इस समझौते के बाद अगस्त तक नामीबिया से आठ चीता कुनो लाने की संभावना बढ़ गई है.

पर्यावरण मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार, अगस्त में 4 नर और 4 मादा चीता लाने की सहमति पर हस्ताक्षर किए गए हैं. भारत ने 1952 में विलुप्त घोषित किए जा चुके चीतों को देश में लाने के लिए नामीबिया के साथ बुधवार को एक महत्वपूर्ण सहमति पत्र (MOU) पर हस्ताक्षर किए.
दुनिया के सबसे तेज दौड़ने वाले पशु चीतों को मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित कुनो-पालपुर राष्ट्रीय उद्यान (केएनपी) में रखा जाएगा. चीते भारत से पूरी तरह विलुप्त हो चुके हैं. इसका मुख्य कारण अधिक शिकार किया जाना और रहने के लिए जगह का न होना बताया जाता है. आखिरी बार 1948 में छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के साल वनों में एक मृत चीता पाया गया था.
दुनिया में चीतों की सबसे अधिक आबादी नामीबिया में है. कूनो राष्ट्रीय उद्यान में चीते को स्थापित करने की कार्य-योजना आईयूसीएन के दिशा-निर्देशों के आधार पर विकसित की गई है. इसके तहत उस स्थान में शिकार की उपलब्धता का ध्यान रखा गया है. साथ ही अन्य मानकों के साथ यह भी ध्यान रखा गया है कि चीते के प्राकृतिक वास के लिये कूनो राष्ट्रीय उद्यान की क्षमता कितनी है.
कूनो राष्ट्रीय उद्यान की वर्तमान क्षमता अधिकतम 21 चीतों की है. एक बड़ा इलाका बहाल हो जाने के बाद वहां 36 चीतों को रखा जा सकता है. शिकार किये जाने वाले जंतुओं की उपलब्धता बढ़ाकर कूनो वन्यजीव प्रखंड (1280 वर्ग किलोमीटर) का शेष हिस्सा भी इसमें शामिल किया जा सकता है.
समझौता-ज्ञापन की मुख्य विशेषतायें-
* जैव-विविधता संरक्षण, जिसमें चीते के संरक्षण पर जोर दिया गया है. साथ ही चीते को उनके पुराने इलाके में दोबारा स्थापित करना है, जहां से वे लुप्तप्राय हो गये थे.
* दोनों देशों में चीते के संरक्षण को प्रोत्साहन देने के लक्ष्य के तहत विशेषज्ञता और क्षमताओं को साझा करना तथा उनका आदान-प्रदान करना.
* प्रौद्योगिकियों को अपनाने, वन्यजीव इलाकों में रहने वाले स्थानीय समुदायों के लिये आजीविका सृजन तथा जैव-विविधता के सतत प्रबंधन के मद्देनजर कारगर उपायों को साझा करने के माध्यम से वन्यजीव संरक्षण और सतत जैव-विविधता उपयोग को प्रोत्साहन.
* जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण सम्बंधी शासन-विधि, पर्यावरण सम्बंधी दुष्प्रभाव का मूल्यांकन, प्रदूषण और अपशिष्ट प्रबंधन और आपसी हितों के अन्य क्षेत्रों में सहयोग.
* जहां भी प्रासंगिक हो, वहां तकनीकी विशेषज्ञता सहित वन्यजीव प्रबंधन में कर्मियों के लिये प्रशिक्षण और शिक्षा के लिये आदान-प्रदान.