हमारे राष्ट्रीय चिह्नों में से एक राष्ट्रीय ध्वज हमारे लिए देश के गौरव और सम्मान का प्रतीक है। लेकिन इसके बनने की कहानी भी उतनी ही रोचक है। इसी क्रम में आज का दिन खास महत्व रखता है।
भारतीय तिरंगे के इतिहास में आज का दिन बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि आज ही के दिन 1876 में मछलीपतनम में पिंगली वेंकैया का जन्म हुआ था जिन्होंने देश के झंडे को कई तरह से डिजाइन किया था। उनकी डिजाइन को 1921 में महात्मा गांधी ने स्वीकृत किया था।
काकीनाड़ा में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान वेंकैया ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि भारत का खुद का राष्ट्रीय ध्वज होना चाहिए, उनका ये विचार गांधी जी को बहुत पसन्द आया। इसके बाद गांधी जी ने वेंकैया को राष्ट्रीय ध्वज का प्रारूप तैयार करने का सुझाव दिया। पिंगली वेंकैया ने फिर पाँच सालों तक तीस विभिन्न देशों के राष्ट्रीय ध्वजों पर शोध किया और अंत में तिरंगे के बारे में सोचा।
साल 1921 में विजयवाड़ा में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पिंगली वेंकैया महात्मा गांधी से मिले थे और उन्हें अपने द्वारा डिज़ाइन लाल और हरे रंग से बनाया हुआ झंडा भी दिखाया था। तब गांधी जी को यंग इंडिया नामक पत्रिका में राष्ट्रध्वज के बारे में लिखे की याद आई जिसमें उन्होने लिखा था कि "भारत में विभिन्न जाति ,धर्मों व मतों के लोग रहते हैं तो राष्ट्रध्वज ऐसा होना चाहिए जिसके लिए वो जान दे सकें।
इसलिए गांधी जी ने हरे व लाल रंग के उपर सफेद रंग की पट्टी जुड़वाई। इसी बीच जालंधर के हंसराज ने झंडे में चरखा चिन्ह बनाने का सुझाव दिया। इस चरखे को प्रगति और आम आदमी के प्रतीक के रूप में माना गया। 1931 में कांग्रेस ने करांची के अखिल भारतीय सम्मेलन में केसरिया, सफ़ेद और हरे तीन रंगों से बने इस ध्वज को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया जिसे गांधी ध्वज, चरखा ध्वज या स्वराज ध्वज कहा गया। 22जुलाई 1947 में मे इस तिरंगे के बीच चरखे की जगह अशोक चक्र ने ले ली और इस तरह से बना हमारा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा।