किडनी फेलियर के रोगियों को नियमित रूप से डायलिसिस कराना पड़ता है क्योंकि उनके रक्त से विषैले तत्वों को उनकी किडनियां फिल्टर करने में असमर्थ हो जाती हैं। ऐसे रोगियों के लिए किडनी ट्रांसप्लांट एक श्रेष्ठ उपाय है क्योंकि इसके बाद आगे की जिंदगी आसान हो जाती है।
क्या होता है किडनी का काम-
किडनी हमारे शरीर के मास्टर कैमिस्ट और होमियोस्टैटिक अवयव होते हैं जो कि शरीर के मध्य भाग में स्थित होते हैं। ये पूरे शरीर के क्रियाकलाप को नियंत्रित व संचालित करते हैं।
ब्लड प्यूरीफाई करने की प्रक्रिया से शरीर में पानी की मात्रा संतुलित करना, रक्तचाप एवं मधुमेह को नियंत्रित करना, शरीर में से अवशिष्ट व विषैले पदार्थों को मूत्र द्वारा बाहर करना तथा आवश्यक पदार्थ विटामिंस, मिनरल्स, कैल्शियम, पोटेशियम, सोडियम इत्यादि को वापस शरीर में भेजकर इलेक्ट्रोलाइट्स को संतुलित करना गुर्दों का प्रमुख काम होता है। अब भी उपचार के कई विकल्प मौजूद हैं लेकिन अधिकतर लोग गुर्दा प्रत्यारोपण का चुनाव करते हैं।
कहां से मिलेगी किडनी-
कानूनन परिवार के रक्त संबंधियों से ही किडनी प्राप्त की जा सकती है। कई बार परिवार के किसी भी सदस्य का ब्लड ग्रुप मरीज से मेल नहीं करता। ऐसे में दूसरे मरीज के पारिवारिक सदस्यों से मैच करने वाली किडनी ली जा सकती है। इसे स्वैपिंग कहते हैं।
किडनी ट्रांसप्लांट के बाद मरीज को कम से कम 8 दिनों तक हॉस्पिटल में रहना पड़ता है जबकि दानकर्ता 3-8 दिनों के बीच कभी भी डिस्चार्ज किया जा सकता है। इसके अलावा मृतक के परिजनों द्वारा दान की गई किडनी को ट्रांसप्लांट करने के लिए तैयार किया जाता है।
कैसा होता है, जीवन किडनी ट्रांसप्लांट के बाद..
किडनी देने के बाद दानकर्ता और लेने वाला दोनों ही पहले की तरह सामान्य जीवन में लौट सकते हैं। किडनी ट्रांसप्लांट के बाद मरीज 2-3 महीने के बाद अपने काम पर वापस लौट सकता है। किडनी ट्रांसप्लांट के बाद का जीवन मरीज द्वारा किए जा रहे परहेज और स्वास्थ्य के प्रति गंभीरता पर निर्भर होता है।