भोपाल: केंद्रीय कार्मिक विभाग और यूपीएससी से क्लीयरेंस होने के तीन महीने बाद भी राज्य वन सेवा के नौ अधिकारियों के आईएफएस इंडक्शन की सूची जारी नहीं हो पाई है. इसकी वजह राज्य वन सेवा के दो अधिकारियों द्वारा वरिष्ठता सूची को लेकर हाईकोर्ट जबलपुर में चुनौती दी थी.
हाईकोर्ट ने राज्य शासन और यूपीएससी से जवाब आने के बाद 9 मई को खारिज कर दिया. अब आईएफएस बनने की दहलीज पर खड़े राज्य वन सेवा के अधिकारियों को केंद्र सरकार द्वारा जारी होने वाले नोटिफिकेशन का इंतजार है.
राज्य वन सेवा से आईएफएस इंडक्शन के लिए 15 फरवरी 23 को डीपीसी हुई थी. इसमें 9 अफसरों को आईएफएस के लिए हरी झंडी दे दी थी किंतु नोटिफिकेशन अभी तक जारी नहीं हो पाया है. हाई कोर्ट जबलपुर ने राज्य वन सेवा के दो अधिकारियों विद्या भूषण मिश्रा और राजबेंन्द्र मिश्रा की सीनियरिटी को लेकर दी गई चुनौती याचिका की सुनवाई करते हुए अपना फैसला दे दिया है.
हाई कोर्ट जबलपुर में चुनौती याचिका को खारिज करते हुए यूपीएससी और राज्य शासन के जवाब को सही माना. यूपीएससी और राज्य शासन ने हाई कोर्ट में प्रस्तुत जवाब में उल्लेख किया है कि आईएफएस के लिए राज्य वन सेवा के 8 वर्ष की निरंतर सेवा जरूरी है.
इन्हें मिली आईएफएस बनने की हरी झंडी-
जिन राज्य वन सेवा के अधिकारियों के नाम आईएफएस के लिए शामिल किए गए हैं उनमें एसडीओ खंडवा इंदू सिंह गडरिया, एसडीओ अनुसंधान विस्तार सागर प्रतिभा शुक्ला, एसडीओ वन विकास निगम जबलपुर सीमा द्विवेदी ( प्रोविजनल प्रमोशन) अनुसंधान एवं विस्तार एसडीओ भोपाल लोकप्रिय भारतीय, एसडीओ कान्हा नेशनल पार्क संजय रायखेरे, एसडीओ वन्य प्राणी शाखा भोपाल अमित पटौदी, एसएफआरआई जबलपुर एसडीओ अमित कुमार सिंह, अनुसंधान विस्तार एसडीओ रीवा अर्चना पटेल और एसडीओ रीवा ऋषि मिश्रा के नाम है.
क्यों दाखिल हुई थी याचिका-
राज्य वन सेवा की वरिष्ठता को लेकर याचिकाकर्ता विद्या भूषण मिश्रा और राजबेंन्द्र मिश्रा की मांग है कि उनकी वरिष्ठता 2011 से मानी जाए. इसी को लेकर याचिका लगाई है. इस संबंध में उनका कहना है कि पीएससी में उनका सिलेक्शन 2011 में हुआ था, तभी से उनकी सीनियरिटी गिनी जाए किंतु विभाग ने उनकी नियुक्ति दिनांक 23 जुलाई 2015 माना.
इसी आधार पर ही उनका नाम आईएफएस इंडक्शन में नहीं भेजा गया. कार्मिक विभाग के नियमानुसार आईएफएस के लिए राज्य वन सेवा के रूप में कम से कम 8 साल की सेवा पूर्ण कर ली हो. पीसीसीएफ यादव ने बताया कि 2015 के अनुसार 8 साल की सेवा विद्या भूषण मिश्रा और राजबेंन्द्र मिश्रा की नहीं हुई है.
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उनकी सेवाओं की गणना संविदा शिक्षक के रूप में चयनित होने की तिथि से गिना जाए. अपने इस तर्क आधार दिया कि उनका चयन पीएससी में हो गया था. इसी आधार पर ही उच्च न्यायालय के निर्देश पर ही उन्हें वरिष्ठ वेतनमान और वरिष्ठ प्रवर श्रेणी वेतनमान दिया गया. इस आधार पर उनकी वरिष्ठता की गिनती वर्ष 2011 से ही की जाए.