इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मुस्लिम समाज की शादियों को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। मुस्लिम शख्स की दूसरी शादी से जुड़े एक फैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि अगर कोई मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी और बच्चों की देखभाल करने में सक्षम नहीं है तो कुरान उसे दूसरी शादी करने की इजाजत नहीं देता है। अदालत ने ये भी कहा, एक मुसलमान को खुद ही पहली पत्नी के रहते दूसरी से शादी करने से बचना चाहिए।

एक पत्नी के साथ न्याय न कर पाने वाले मुस्लिम को खुद कुरान भी दूसरी शादी करने की इजाजत नहीं देता। वहीं हाईकोर्ट ने कुरान के हवाले से कहा कि अगर मुस्लिम अपनी पत्नी और बच्चों की देखभाल करने में सक्षम नहीं है, तो उसे दूसरी शादी करने की इजाजत नहीं होगी।

इस फैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर जोर देते हुए कहा कि अगर पत्नी को ऐसी परिस्थितियों में अपने पति के साथ रहने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा।  मौजूदा समय की जरूरत है कि लोगों को जागरूक किया जाए और उन्हें बताया जाए कि महिलाओं का सम्मान करना और उनके साथ गरिमापूर्ण व्यवहार करना जरूरी है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक टिप्पणी करते हुए ये भी कहा, कि महिलाओं का सम्मान करने वाले देश को ही सभ्य कहा जा सकता है।

दरअसल, एक वादी ने दूसरी शादी करने के बाद अपनी पहली पत्नी को इस बात की जानकारी नहीं दी थी। वह अपनी दोनों पत्नियों के साथ रहना चाहता था, हालांकि पहली पत्नी ने शख्स के साथ रहने और उसे किसी दूसरी महिला के साथ बांटने से इनकार कर दिया, जिसके बाद पति ने दाम्पत्य अधिकारों की बहाली की मांग करते हुए फैमिली कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। दोनों पक्षों को सुनने के बाद फैमिली कोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर दी थी। जिसके बाद इस आदेश को चुनौती देते हुए पति ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।