कांग्रेस के ममता बनर्जी को मर्जर के ऑफर की चर्चा है शरद पवार की पार्टी को भी कांग्रेस में मर्ज करने का प्रस्ताव सुर्ख़ियों में हैं. क्षेत्रीय दल टूट रहे हैं तो निश्चित ही कांग्रेस को खोई जमीन वापस आने का भरोसा बढ़ रहा है. अभी तो कांग्रेस ने ममता बनर्जी की पार्टी की मर्जर की खबर को अफवाह बताया है लेकिन सियासत में कोई भी अफवाह नहीं होती. कोई विचार आया है तो उसमें लाभ हानि का गणित तलाशा जाएगा.
प्रलय के समय विलय की बात स्वाभाविक है. जब बाढ़ से बचाव के लिए सांप और नेवले एक ही नाव पर सवार हो जाते हैं. अभी तो ममता की टीएमसी में सांसद और विधायक दोनों टूट चुके हैं. विधायक दल को तो विधानसभा में मान्यता भी मिल गई है. संसदीय दल के आवेदन पर लोकसभा स्पीकर विचार कर रहे हैं जल्दी ही उस पर भी फैसला हो जाएगा. ताजा हालात के अनुसार तो ममता की टीएमसी में वह क्षमता ही नहीं बची है कि मर्जर की प्रक्रिया पूरी हो पाए. दो तिहाई बहुमत के समर्थन के बिना मर्ज़र की प्रक्रिया कानूनी रूप से संभव नहीं है.
कांग्रेस अगर मर्ज़र चाहती है तो केवल TMC के संगठन पर ही उसकी नजर नहीं है बल्कि उसकी संपत्तियों पर भी नजर है, जो कमाया है वह गंवाना कोई भी नेता नहीं चाहता. टीएमसी कांग्रेस में विलय करेगी तो उसकी सारी संपत्ति कांग्रेस के हाथ चली जाएगी, फिर उस पर निर्णय ममता बनर्जी नहीं कांग्रेस प्रबंधन करेगा. कमाई के लिए ही तो सारी अनैतिकताएं अनाचार और अन्याय किए जाते हैं और उसी को आसानी से छोड़ देना कैसे संभव है?
कांग्रेस ममता बनर्जी के साथ जितनी ममता दिखा रही है वह टीएमसी से ज्यादा कांग्रेस के अस्तित्व के लिए है. यह एक सियासी अभिषेक है. ममता बनर्जी का हश्र सबके लिए सबक है, जो बोया है वह यहीं काटना पड़ता है. लीडरशिप स्वभाविक गुण होता है. इसको वंशानुगत ट्रांसफर नहीं किया जा सकता. यद्यपि क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस ने तो इसे वंशानुगत ही बना दिया गया है. टीएमसी में जो टूट हो रही है उसके लिए सारे बागी नेता अभिषेक बनर्जी को ही जिम्मेदार बता रहे हैं.
क्षेत्रीय दलों की चुनावी पराजय से राजनीति दो दलीय व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ सकती है. अभी कांग्रेस का गठबंधन केंद्र स्तर पर तो साथ है लेकिन राज्य स्तर पर उसके सहयोगी एक दूसरे के खिलाफ चुनावी मैदान में होते हैं. कुछ दिन पहले ही राहुल गांधी जिस तरह से ममता सरकार के खिलाफ जहर उगल रहे थे और अब जिस तरह प्रेम प्रदर्शित कर रहे हैं उसको देखकर तो गिरगिट भी शरमा जाए.
कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियों की वीकनेस वंशवाद है. लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल में भी विरासत का विवाद हार का कारण बना था. लाल की विरासत भावी पीढ़ी सँभालने में सफल नहीं हो पा रही है. उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने भी बेटे अखिलेश को सियासी विरासत दी थी लेकिन अखिलेश अपनी नेतृत्व क्षमता से पार्टी को सत्ता की ऊंचाई तक नहीं पहुंचा पाए. अगले साल यूपी में चुनाव है, यह चुनाव अखिलेश के लिए निर्णायक साबित होगा. अगर पश्चिम बंगाल जैसा परिणाम आता है तो फिर सपा का बिखराव भी रोका नहीं जा सकेगा.
नेतृत्व क्षमता व्यक्तिगत है, यह विरासत से नहीं आ सकती है. इतिहास भरा पड़ा है कितने शहंशाह और सम्राट वारिस की अक्षमता के कारण मिट्टी में मिल गए. टीएमसी में ममता बनर्जी ने अभिषेक बनर्जी को अपना वारिस बनाया. अब यह पार्टी बिखर गई है. कांग्रेस में इतनी बड़ी टूट अब तक नहीं हुई है लेकिन राहुल गांधी से नाराज होकर बहुत सारे कांग्रेसी पार्टी छोड़ गए हैं. जो भी नेता कांग्रेस से गए सबने राहुल गांधी की अक्षमता और कार्य प्रणाली पर ही सवाल उठाये हैं.
आजादी की लड़ाई की विरासत कांग्रेस के साथ है. अगर उसका वारिस अक्षम भी होगा तो पार्टी के लिए उसकी अक्षमता के दुष्परिणाम पूरी तरह सामने आने में लंबा वक्त लगेगा. चावल के एक दाने के उदाहरण से कोई हालात समझना चाहे तो राहुल गांधी की स्ट्रैंथ उसे पहले ही समझ आ चुकी होगी. जब से उन्होंने पार्टी पर नियंत्रण शुरू किया है तब से चुनावी पराजय का लंबा इतिहास है.
ज्यादातर क्षेत्रीय दल कांग्रेस से टूट कर ही बने हैं. ऐसे दलों की पराजय कांग्रेस के लिए बड़ा अवसर हो सकती है कांग्रेस चाहेगी कि उससे टूटे नेता और उनकी पार्टी फिर से कांग्रेस में विलय कर लें लेकिन कोई भी पार्टी ऐसा नहीं कर सकती है. विलय न होने के पीछे कोई राजनीतिक विचारधारा का विषय नहीं है बल्कि धन-संपत्ति का विषय है. जो क्षेत्रीय नेता नैतिक-अनैतिक ढंग से पार्टी के लिए संपत्तियां कमाते हैं वह दूसरी पार्टी के साथ मिलकर उसे मिटाने की हिम्मत नहीं दिखा सकते. मर्जर पॉलिटिकल मर्डर जैसा है
वारिस के चयन में जो भी राजनीतिक दल नेतृत्व क्षमता से ज्यादा परिवार या स्वार्थ को प्राथमिकता देगा उसका हश्र वही होगा जो कांग्रेस और टीएमसी को भुगतना पड़ रहा है. राजनीति परिवार की संपत्ति नहीं है वह सेवा का संकल्प है. यह संकल्प खुद के भीतर पनपता और जड़ पाता है. वारिसों की अक्षमता के कारण राजनीतिक दलों की मिटती विरासत स्वार्थी सोच के कारण है.
कई बार तो बेटा और बेटी में भी विरासत के लिए अंतर किया जाता है. कांग्रेस की ममता, सियासी अभिषेक के लिए सही हो सकती है लेकिन दो अक्षमता एक साथ आने से वह सक्षमता नहीं बन सकती.