भोपाल. मिशन- 2023 को लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भगोरिया उत्सव में हिस्सा लेकर आदिवासियों में पार्टी की पकड़ को और मजबूत बनाने में लगे थे, वहीं आदिवासी बहुल झाबुआ-अलीराजपुर जिले में भगोरिया उत्सव में ही कांग्रेस के दो गुटों में वर्चस्व की जंग सड़कों पर दिखी. मारा-पीटी और तोड़फोड़ के बाद थाने में दोनों गुटों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई. इस घटना से क्षुब्ध होकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने पूर्व मंत्री एवं दिग्विजय सिंह के खास सिपहसालार आदिवासी विधायक कांतिलाल भूरिया के दबाव में आकर दबंग आदिवासी नेता महेश पटेल को पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया. पटेल के निष्कासन से झाबुआ और अलीराजपुर जिले के आदिवासी नेताओं एवं कार्यकर्ताओं में असंतोष है. प्रदेश में सत्ता गांवने के बाद कांग्रेस का संक्रमण काल खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था. जिन आदिवासियों के दम पर कांग्रेस सत्ता में आई थी, अब वे प्रदेश नेतृत्व कमलनाथ और उनके खास छत्रपों खासकर भूरिया परिवार से नाराज दिखाई दे रहे हैं. संगठन की सबसे बुरी दुर्गति आदिवासी बहुल झाबुआ-अलीराजपुर जिले की है. विधानसभा के उपचुनाव में जीते पूर्व मंत्री कांतिलाल भूरिया अपने परिवारिक वर्चस्व को बनाए रखने के लिए पार्टी के संगठन को खोखला करते जा रहे हैं.

*झाबुआ-अलीराजपुर में कांग्रेस भूरिया परिवार का जेबी संगठन*
लंबे समय से झाबुआ-अलीराजपुर में कांग्रेस भूरिया परिवार का जेबी संगठन बन गया है. झाबुआ और अलीराजपुर जिले में कांग्रेस की राजनीति भूरिया परिवार के इर्द-गिर्द रही है. यही वजह है कि कांतिलाल भूरिया अपने राजनीतिक आका दिग्विजय सिंह की दम पर किसी और को राजनीतिक रूप से पनपने नहीं दे रहे हैं. दिग्विजय सिंह ने लोकसभा चुनाव हारने के बाद उपचुनाव में पूर्व विधायक जेवियर मेड़ा की जगह कांतिलाल भूरिया को मैदान में उतारा और उन्हें विधायक बनाया. इसके बाद उनके बेटे विक्रांत भूरिया को युवा कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनवाया. कांग्रेस में लंबे समय से कांतिलाल भूरिया को दृष्टिगत रखते हुए झाबुआ और अलीराजपुर के राजनीतिक निर्णय लिए जाते रहे हैं. यही वजह है कि जोबट विधायक सुलोचना रावत बीजेपी की सदस्य से बन गई. सुलोचना रावत का परिवार कांग्रेस का सबसे पुराना परिवार रहा है. उनके पिता सात बार के विधायक रह चुके थे किंतु भूरिया के राजनीतिक प्रताड़ना के चलते उन्हें मजबूरन सुलोचना रावत को कांग्रेस से बाय-बाय, टाटा-टाटा कहना पड़ा. भूरिया के चलते ही जेवियर मेड़ा हाशिए पर धकेल दिए गए है. जबकि वे झाबुआ विधानसभा का चुनाव में तब जीते थे, जब प्रदेश में मोदी लहर थी. 2018 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के अनुकूल वातावरण में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमल नाथ जेवियर मेडा को टिकट न देकर कांतिलाल भूरिया के राजनीतिक आका दिग्विजय सिंह के दबाव में विक्रांत भूरिया को टिकट दिया. नतीजा भूरिया चुनाव हार गए. बीजेपी विधायक जीएस डामोर के सांसद बनने के बाद झाबुआ से दिया और विधानसभा उपचुनाव में लोकसभा में पराजित कांतिलाल भूरिया को प्रत्याशी बनाकर मेड़ा के दावे को खारिज कर दिया. इसके बाद से ही भूरिया परिवार के खिलाफ कांग्रेसमें संतोष के बीज अंकुरित हो रहे हैं. मिशन 2023 में इसका नुकसान कांग्रेस को भुगतना पड़ सकता है.
*महेश पटेल के बढ़ते राजनीतिक कद से भूरिया को है खतरा*
अलीराजपुर में बढ़ते महेश पटेल के राजनीतिक कद से भूरिया परिवार राजनीतिक रूप से असुरक्षित महसूस करने लगा था. महेश पटेल के भाई मुकेश पटेल अलीराजपुर के विधायक हैं. महेश पटेल की पत्नी सेना पटेल अलीराजपुर नगर पालिका की अध्यक्ष रह चुकी हैं. महेश पटेल स्वयं झाबुआ जिला पंचायत के उपाध्यक्ष रह चुके हैं. अलीराजपुर में इंग्लिश मीडियम का प्रतिष्ठित स्कूल संचालित करते हैं. झाबुआ-अलीराजपुर कांग्रेस की राजनीति में महेश पटेल की जबरदस्त दखलंदाजी रही है. महेश पटेल के बढ़ते वर्चस्व को समाप्त करने के लिए ही जोबट विधानसभा चुनाव के उपचुनाव में भूरिया और उनके समर्थकों द्वारा भितरघात किया गया. चुनाव परिणाम महेश पटेल के प्रतिकूल आए. तभी से भूरिया और पटेल के बीच राजनीतिक द्वंद सड़कों पर आ गया. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने भी दोनों नेताओं को बैठा कर सुलह कराने का प्रयास भी नहीं किया गया.