कैलाशनाथ को समर्पित (भगवान शिव)

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कैलाश मंदिर, औरंगाबाद विवरण

कैलाश मंदिर औरंगाबाद से लगभग 30 किलोमीटर दूर एलोरा गांव के पास स्थित है। यह प्रसिद्ध मंदिर अपनी अद्भुत वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। एलोरा में 34 उत्खननों में से यह सबसे बड़ी उत्खनन है, जिसमें लगभग एक शताब्दी लगी थी। कैलाश मंदिर एक चट्टान के टुकड़े को तराश कर बनाया गया है। ऐसा माना जाता है कि कैलाश मंदिर का निर्माण 8वीं शताब्दी के मध्य में राष्ट्रकूट वंश के राजा कृष्ण प्रथम (757-775) के निर्देशन में शुरू हुआ था। यह मंदिर दुनिया की सबसे बड़ी अखंड संरचना है जिसे चट्टान के एक टुकड़े से उकेरा गया है और यह अब तक की सबसे व्यापक रॉक-कट परियोजना है।

कैलाश मंदिर में पुराणों से देवताओं, जानवरों और अन्य पौराणिक जीवों के चित्र इस तरह से हैं जो एक आनंदमयी आनंद में हैं। महाभारत और रामायण के दृश्यों को दिखाते हुए पूरे पैनल को उकेरा गया था। इसे दुनिया की सबसे बड़ी अखंड संरचना और अब तक की सबसे व्यापक रॉक-कट स्कीम के रूप में मापा जाता है। यह मंदिर दिसंबर के महीने में एमटीडीसी द्वारा आयोजित एलोरा उत्सव का स्थान है। एलोरा उत्सव संगीत और नृत्य का उत्सव है और इसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं।

राष्ट्रकूट वंश के राजा उत्साही निर्माता थे। महाराष्ट्र के औरंगाबाद में स्थित एलोरा नामक पहाड़ी पर राष्ट्रकूटों के द्वारा बनाए गए गुहा मंदिर प्राप्त हुए हैं।

 बौद्ध शिल्प विचारों का अनुकरण करते हुए ब्राह्मण धर्मानुयायियों ने भी धार्मिक क्रियाओं की आवश्यकतानुसार स्तंभमय भवन खुदवाकर बनवाए। एलोरा में ये शिलामंदिर आधे मील तक फैले हुए हैं। इस प्रकार के मंदिरों के मुख्य उदाहरण हैं रावण की खाई, रामेश्वर, दशावतार तथा कैलाश मंदिर। दीवारों पर चारों ओर भीत्ति स्तंभों के बीच पौराणिक हिंदू देवताओं की उभरी आकृतियाँ हैं एक ओर वैष्णव और दूसरी ओर शैव गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। पर्वत मालाओं -1 को खोदकर भवन निर्माण के विकास की चरमावस्था एलोरा का कैलाश मंदिर है। यह संपूर्ण मंदिर एक ही पाषाण को काटकर बनाया गया है। यह मंदिर राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण प्रथम ने बनवाया था

। उसके पास अनेक विजयों से प्राप्त प्रभूत धनराशि थी। मंदिर के नजदीक ही पाषाण काटकर एक लंबी पंक्ति में हाथियों की मूर्तियाँ बनाई गई हैं। केलाश मंदिर का निर्माण पल्लवों की राजधानी कांची से बुलाए गए कलाकारों ने किया कैलाश मंदिर की विशेषता यह है कि इसे बनाने के लिए पर्वत को नीचे भीतर की ओर खोदा ही नहीं गया अपितु शिल्पियों ने चट्टान को शीर्ष भाग से तराशना शुरु किया। इस प्रकार ऊपर से नीचे की ओर तराशकर मंदिर के सभी अंग बनवाए गए। कैलाश मंदिर का विमान सामान्तर चतुर्भुज के आकार में बना हुआ है। 150 फुट लंबा और 1000 फुट चौड़ा यह विमान 25 फुट ऊँचे चबूतरे पर बना हुआ है।

 विमान के चारों ओर पांच छोटे मंदिर है। मंदिर की प्रमुख इमारत के बाद नंदी मंदिर बनवाया गया है जिसके दोनों ओर 51 फुट ऊँचे दो ध्वजस्तंभ हैं जिन पर त्रिशुल स्थापित किए गए हैं। संभवतः राष्ट्रकूट कला में ही एलिफैंटा की कुछ गुफाओं का एवं उनकी कुछ स्थापत्य कृतियों का निर्माण हुआ। एलिफैंटा की गुफा मंदिर वास्तुकला का ही अंग होती है। यह गुहा भवन एक स्तंभ युक्त मंडप है। स्तंभों की छह पंक्तियाँ गुहा की छत को धारण किए हुए है। गर्भगृह के मंदिर के पृष्ठ भाग से लगा हुआ प्रदक्षिणा पथ नहीं है। यह विशाल मंदिर तराशी हुई विशाल मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है जिनमें त्रिमूर्ति सबसे प्रभावशाली है। इसके बाद शिव-पार्वती विवाह तथा नटराज की मूर्तियों का स्थान है।

पांड्यों के राज्यकाल में द्रविड़ शैली पनपती रही किंतु कोई मंदिर नहीं बने मंदिर निर्माण शैली में अब नई प्रवृत्तियाँ दिखाई देती है। अब तक वास्तु कलाकारों ने अपने शिल्प कौशल को मंदिर, विशेषत: विमानों पर प्रयुक्त किया परंतु पांड्यों के काल में यह प्रथा बंद हो गई। अब शिल्प कौशल को मंदिर के सहायक तथा बाह्य वृत्ति भागों पर केंद्रित किया गया। अब मंदिर छोटे होते थे किंतु उनके प्रांगण में अब चारों और अनेक प्राचीर बनाए जाते थे। ये प्राचीर तो सामान्य होते थे किंतु इनके प्रवेशद्वार जिन्हें गोपुरम् कहा जाता था, भव्य एवं विशाल और धनी शिल्पकारिता से अलंकृत होते थे। तिरूमलाई मंदिर, चिदंबरम मंदिर, कुंभकोणम मंदिर इस श्रेणी की कुछ प्रसिद्ध कृतियाँ है।

पल्लवों तथा पांड्यों की कला परंपरा को न केवल बनाए रखा बल्कि विकसित भी किया। उनके लगभग चार शताब्दी के लंबे अंतराल वाले शासन में पूरा तमिल क्षेत्र (देश) मंदिरों से लबालब हो गया।