कैप्टन विक्रम बत्रा को आज कौन नहीं जानता। कारगिल दिवस के मौके पर कैप्टन विक्रम बत्रा को पूरा देश याद कर उनकी वीरता और देशप्रेम को नमन कर रहा है। कारगिल युद्ध में विपरीत परिस्थितियों में भी अपने शौर्य से उन्होंने दुश्मनों को खदेड़ कर भारतीय सीमाओं को सुरक्षित किया था । मातृभूमि के प्रति उनके प्रेम से आज भी हर देशवासी प्रेरणा लेता है।

 कैप्टन बत्रा पीवीसी भारतीय सेना के एक अधिकारी थे। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान उनके कार्यों के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत गणराज्य के सर्वोच्च सैन्य अलंकरण परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। कैप्टन बत्रा को उनकी टुकड़ी के लोग शेरशाह के नाम से जाते थे।

कुछ समय पहले कैप्टन विक्रम बत्रा के जीवन और उनकी प्रेम कहानी को लेकर एक फ़िल्म 'शेरशाह' भी बनी थी, जिसे काफी पसंद किया गया था । इस फ़िल्म के बाद ही कैप्टन बत्रा की कहानी हिंदुस्तान के घर-घर तक पहुंच गई थी।

पालमपुर के रहने वाले पेशे से शिक्षक जी. एल बत्रा और कमलकांता बत्रा के घर 9 सितंबर को 1974 को दो बेटियों के बाद दो जुड़वां बच्चों का जन्म हुआ उनकी मां ने श्रीरामचरितमानस में गहरी श्रद्धा होने ले दोनों के नाम लव और कुश रखे, लव यानि कि विक्रम और कुश यानि कि विशाल।

विक्रम बत्रा ने सेना में जाने के लिए 1996 में सीडीएस की परीक्षा दी थी,  इलाहाबाद में सेवा चयन बोर्ड के चुने हुए शीर्ष 35 उम्मीदवारों में से कैप्टन बत्रा एक थे। भारतीय सैन्य अकादमी में शामिल होने के लिए कैप्टन बत्रा ने कॉलेज से ड्रॉपआउट किया था।

दिसंबर 1997 में प्रशिक्षणपूरा होने पर 6 दिसंबर 1997 को जम्मू के सोपोर नामक जगह पर सेना की 13 जममू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंटके पद पर नियुक्ति मिली थी। 1999 में कैप्टन बत्रा ने कमांडो ट्रेनिंग के साथ और कई प्रशिक्षण भी लिए। कारगिल युद्ध के दौरान अपनी शहादत से पहले, होली के त्यौहार के दौरान सेना से छुट्टी मिलने पर अपने घर आए थे वहां अपनी सबसे अच्छी दोस्त और मंगेतर डिम्पल चीमा से मिले। उनकी डिम्पल से युद्ध के बारे में भी कुछ बातचीत हुई थी, तो कैप्टन ने कहा था या तो तिरंगे को लहराकर आउंगा य़ा पिर तिरंगे में लिपटा हुआ आउंगा, पर आउंगा ज़रूर। और सच में भारत मां का ये सपूत देश के लिए शहीद हो गया।