आरती पूजा का अभिन्न अंग है। सच्चे मन और भक्ति से की जाने वाली आरती बहुत ही लाभकारी मानी जाती है। कहा जाता है कि आरती करने से हजारों यज्ञ करने के बराबर अक्षय फल मिलता है। आरती करते समय साधक का मन स्थिर रहना चाहिए। ईश्वर भक्ति की भावना होनी चाहिए। सनातन शास्त्र में दिन में पांच बार आरती करने का नियम है। इसके लिए पूजा की थाली में शुद्ध घी में लिपटे दीपक जलाकर आरती की जाती है। पांच दीपों से आरती करने को पंच प्रदीप आरती कहते हैं।
भक्तों पर भगवान की विशेष कृपा होती है। भक्ति में पूजा और उपवास शामिल हैं। वहीं आरती के साथ पूजा का समापन होता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि पूजा के अंत में आरती क्यों की जाती है?
धार्मिक पंडितों के अनुसार आरती पूजा की एक विधि है। इस समय थाली में घी, कपूर और बाती जलाकर भगवान की आरती की जाती है। आइए विस्तार से जानते हैं भगवान की आरती करने का धार्मिक महत्व-
यह एक धार्मिक मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति मंत्र नहीं जानता, पूजा की विधि नहीं जानता, लेकिन आरती करता है, तो भगवान उसकी पूजा को पूरी तरह से स्वीकार करते हैं। आरती का महत्व सर्वप्रथम "स्कन्द पुराण" में वर्णित है। आरती हिंदू पूजा परंपरा का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है।
किसी भी प्रकार की पूजा, यज्ञ-हवन, पंचोपचार-षोडशोपचार पूजन आदि के बाद अंत में आरती की जाती है। आरती आम तौर पर पांच दीपों के साथ की जाती है, जिसे 'पंचप्रदीप' भी कहा जाता है।