भोपाल: शिवपुरी कलेक्टर अक्षय कुमार सिंह ने सीपीएफ एवं संचालक माधव नेशनल पार्क को पत्र लिखकर चेताया है कि सोन चिरैया सेंचुरी क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले 32 गांव के किसानों में आक्रोश है. आए दिन हुए आंदोलन की धमकी दे रहे हैं. कलेक्टर ने साफ तौर पर कहा है कि यदि इन गांवों के किसानों को क्रय विक्रय की अनुमति नहीं दी गई तो कभी भी जिले में कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है.

कलेक्टर ने अपने पत्र में कहा है कि सेंचुरी के अंतर्गत भूमि वन भूमि नहीं है. याद किसानों के स्वामित्व की भूमि है. सेंचुरी के लिए सुरक्षित होने की वजह से भूमि के क्रय विक्रय पर प्रतिबंध लगा है. शासन को भी राजस्व हानि हो रही है और भूमि का क्रय विक्रय ना कर पाने के कारण किसानों को आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. इसके कारण किसान बार-बार आंदोलित हो रहे हैं. कलेक्टर ने अपने पत्र के साथ भारतीय किसान यूनियन द्वारा राज्यपाल को ज्ञापन ज्ञापन की प्रति भी संलग्न की है. भारतीय किसान यूनियन राज्यपाल के नाम ज्ञापन में लिखा है कि 25 मार्च 2022 को सोन चिरैया सेंचुरी को हटाने के लिए समस्त 32 गांव के सरपंचों द्वारा ठहराव के प्रस्ताव पारित किया है. सरपंचों ने अपने ठहरा प्रस्ताव में कहा है कि शिवपुरी जिले की नरवर और करेरा तहसील में आने वाले सोन चिरैया सेंचुरी के अंतर्गत समस्त 32 गांव को संरक्षण से मुक्त किया जाए, क्योंकि ना तो यहां सोन चिरैया है और ना ही यह भूमि वन विभाग की है. यहां की संपूर्ण भूमि किसानों के स्वामित्व की है. आरक्षित क्षेत्र होने की वजह से भूमि के क्रय विक्रय पर पूर्णता प्रतिबंध लगा हुआ है. इसके अलावा सड़क निर्माण कार्य, विद्युत लाइन बिछाने और अन्य विकास कार्य एक करने में भी अडचने आ रही हैं.

कहां का है मामला :

202 वर्ग किलोमीटर में फैले सोन चिरैया सेंचुरी के अंतर्गत आने वाले 32 गांवों की भूमि को डिनोटिफाई करने का मामला केंद्र सरकार में अटका है. नेशनल वाइल्डलाइफ सलाहकार बोर्ड की बैठक में अभी तक सहमति नहीं दी गई है. जबकि राज्य शासन ने डी-नोटिफाई करने का निर्णय लेकर प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा है. नेशनल वाइल्ड लाइफ सलाहकार बोर्ड ने करेरा सेंचुरी को समाप्त करने के पहले दमोह में रानी दुर्गावती सेंचुरी को विस्तार करने की शर्त रखी है. 

1994 से नहीं दिखी सोन चिरैया :

सेंचुरी में पदस्थ रह चुके एसके गुप्ता ने 1994 में विभाग को पत्र लिखकर यह अवगत करा दिया था कि सोन चिरैया दिखाई नहीं दे रही है. गांव के लोगों में असंतोष है. दरअसल सेंचुरी 1982 में घोषित किया गया. जिस जगह का चयन किया गया, वहां पर 1 इंच जमीन बन भूमि की नहीं थी. ऐसे में गांव वालों का विरोध लाजमी था. गांव के किसानों के विरोध पर अफसरों ने कोई ध्यान नहीं दिया. एक वजह यह भी रही कि किसानों के आक्रोश के चलते इक्का-दुक्का सोन चिरैया दिखी भी तो उसको मार दिया गया.

इनका कहना है: 

राज्य शासन ने निर्णय करके प्रस्ताव नेशनल वाइल्डलाइफ बोर्ड को भेज दिया है. जब भी बोर्ड की बैठक होगी सोन चिरैया की भूमि को डिनोटिफाई कर दिया जाएगा. "जेएस चौहान, वन्य प्राणी पीसीसीएफ"