भोपाल: लोकसभा चुनाव के पहले और बाद में कांग्रेस से बीजेपी में गए कद्दावर नेता अपने राजनीतिक पुनर्वास की बांट जोह रहे हैं। यानी उनके राजनीतिक भविष्य पर धुंध छाई हुई है। कांग्रेस के फ्रंट लाइनर नेता एवं पूर्व मंत्री सुरेश पचौरी हो फिर विधायक निर्मला सप्रे की स्थिति भाजपा में बिन बुलाए मेहमान जैसी बन रही है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि कांग्रेस से आयातित नेताओं की बदौलत ही भाजपा प्रदेश में 29 लोकसभा सीटों में से 29 ही जीती। प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में पहली बार बीजेपी को मध्यप्रदेश में लोकसभा की सभी सीटों पर विजय हासिल हुई। यहां तक कि भाजपा को कमलनाथ का किला छिंदवाड़ा भी डहाने में सफलता मिली। 

लोकसभा चुनाव के दरमियान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के नेतृत्व वाली कांग्रेस में ऐसी भगदड़ मची कि पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं प्रदेश अध्यक्ष रह चुके सुरेश पचौरी जैसे कई वरिष्ठ नेताओं का मोह भंग हो गया और उन जैसे कईयों ने भाजपा का दामन थाम लिया। पचौरी के साथ उनके समर्थक पूर्व विधायक संजय शुक्ला, अर्जुन पलिया के अलावा पूर्व विधायक गजेंद्र राजूखेड़ी और पूर्व विधायक विशाल पटेल, इन सभी ने इस उम्मीद से भाजपा का दामन थामा कि लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद उनका राजनीतिक पुनर्वास अवश्य होगा पर अभी उनके राजनीतिक भविष्य पर धुंध छाई हुई है। 

राजनीतिक पुनर्वास की आशा और निराशा के बीच कांग्रेस के कद्दावर नेता सुरेश पचौरी के राज्यपाल बनने की खबरें भी सुर्खियों में रही किंतु वह हकीकत में तब्दील नहीं हो पाई। वैसे भी राजनीति संभावनाओं का खेल है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह बीजेपी के राजनीति में अप्रत्याशित फैसला लेते आ रहे हैं। यही वजह है कि कांग्रेस से बीजेपी में गए नेता अपने राजनीतिक पुनर्वास की 'दीए' (दीपक) जलाए हुए हैं।

दीपक सक्सेना और सैयद जाफर भी ओझल

छिंदवाड़ा में बीजेपी को सफलता दिलाने में अहम भी का निभाने वाले पूर्व मंत्री दीपक सक्सेना, पूर्व विधायक गंभीर सिंह, और सैयद जाफर, विधायक कमलेश शाह समेत दर्जनों नेता भाजपा संगठन में बिन बुलाए मेहमान की तरह दिखाई देते हैं। विधायक कमलेश शाह को छोड़कर इन नेताओं को भाजपा की ओर से कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं दी गई है। हालांकि कमलेश शाह को उम्मीद थी कि रामनिवास रावत की तरह उन्हें भी मंत्रिमंडल में जगह मिलेगी किंतु ऐसा नहीं हो पाया। इसी प्रकार महाकौशल से कांग्रेस छोड़ने वाले नेताओं में महापौर जगत बहादुर सिंह, पूर्व विधायक निलेश अवस्थी, पूर्व महाधिवक्ता शशांक शेखर, डिंडोरी जिला पंचायत अध्यक्ष रुदेश परस्ते, उपाध्यक्ष अंजू जितेंद्र, ये सभी राजनीति की मुख्य धारा से ओझल नजर आ रहे हैं।

दुविधा में है विधायक ने निर्मला सप्रे

राजनीतिक पुनर्वास को लेकर विधायक निर्मला सपने भी दुविधा में है। शायद यही वजह है कि बीना से कांग्रेस की टिकट से निर्वाचित विधायक निर्मला सप्रे विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा देने को लेकर असमंजस में है। जबकि भाजपा नेतृत्व उन्हें विधानसभा से इस्तीफा देने के लिए दबाव बना रहा है। सप्रे के नजदीकी सूत्रों का कहना है कि  वह बीना को जिला बनाने की शर्त पर ही भाजपा में गईं थी। पिछले दिनों मुख्यमंत्री मोहन यादव बीना गए भी पर विधायक सप्रे की शर्त पूरी करने की घोषणा नहीं कर पाए। बीना जिला बनाने की मार्ग में खुरई की जनता की मांग आगे आड़े आ रही है। भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मंत्री भूपेंद्र सिंह ने खुरई को जिला बनाने की मांग को लेकर अभियान चला दिया है। इसके कारण बीना का जिला बनना अब खटाई में पड़ता दिखा रहा है। 

यूपी के चुनाव परिणाम भाजपा नेतृत्व धर्म संकट में

यूपी के लोकसभा चुनाव परिणाम ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व धर्म संकट में है। उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के दरमियान दूसरे दलों के नेताओं को विशेष तरजीह देने से भाजपा के निष्ठावान नेताओं और कार्यकर्ताओं नाराजगी की वजह से ही भाजपा के लिए अप्रत्याशित चुनाव परिणाम आए। इसी वजह से पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अब दूसरे दलों से आए नेताओं राजनीतिक पुनर्वास का फैसला लेने में आनाकानी कर रहा है। वैसे भी मध्य प्रदेश में भाजपा संगठन काफी मजबूत है।