देश को 1947 में आजादी मिल चुकी थी लेकिन इसके दो साल बाद तक भोपाल रियासत पर नवाब की ही हुकूमत कायम रही। नवाब हमीदुल्ला भोपाल को आजाद भारत में शामिल नहीं करना चाहते थे। तब भोपाल की आज़ादी के लिए विलीनीकरण आंदोलन शुरू हुआ। आंदोलन में शामिल सत्याग्राही जेल गए, ज्यादती और जुल्म झेला, तब जाकर1 जून 1949 को भोपाल की अवाम को आजादी मिली।

भोपाल को आज़ादी दिलाने में हज़ारों सत्याग्रहियों ने अपना सब कुछ दांव पर लगा नवाबी शासन के खिलाफ आवाज बुलंद की। भोपाल से उठी आज़ादी की आवाज को साथ मिला सरदार वल्लभ भाई पटेल का। इसके बाद नवाब हमीदुल्ला के सामने कोई विकल्प नहीं बचा और भोपाल रियासत देश का हिस्सा बन गई।

भोपाल की मुश्किलें भारत में विलय के साथ खत्म नहीं हुईं। एक नवंबर, 1956 को राज्यों के पुनर्गठन के बाद नया मध्य प्रदेश राज्य बना तो राजधानी को लेकर काफी जद्दोजहद हुई। राजधानी के लिए पांच प्रमुख विकल्प थे- भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर और रायपुर। ग्वालियर और इंदौर मध्य भारत के बड़े शहर थे और भोपाल के मुकाबले ज्यादा विकसित थे। रायपुर मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल का गृह नगर थे। वे उसे राजधानी बनाना चाहते थे। सबसे गंभीर दावेदारी जबलपुर की थी।

इसके बीच भोपाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री शंकरदयाल शर्मा केंद्र सरकार को यह समझाने में सफल रहे कि यहां बहुत सारी सरकारी इमारतें और जमीन खाली हैं। सरकारी कामकाज के लिए यहां अलग से जमीन खरीदने और इमारतें बनाने की जरूरत नहीं होगी। शंकरदयाल शर्मा के तर्कों के बाद भोपाल को राजधानी घोषित किया गया।