संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती पूरे देश में मनाई जा रही है। लेकिन मप्र में उनकी जन्मस्थली महू में राजनीतिक दलों के नेताओं का खास जमावड़ा है। यहां मुख्य समारोह हो रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व सीएम कमलनाथ, उप पूर्व सीएम अखिलेश यादव, भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद सहित कई राजनीतिक दलों के नेता श्रद्धांजलि देने के लिए यहां पहुंचे हैं।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज डा अंबेडकर से जुड़े पांच स्थानों को पंचतीर्थ बनाने व इसे राज्य सरकार की तीर्थ दर्शन योजना से जोड़ने का ऐलान किया। इस तारतम्य में धर्मस्व विभाग ने आदेश भी जारी कर दिये। शिवराज ने कहा कि बाबा साहेब के जीवन से जुड़े, जिसमें जन्म भूमि महू, शिक्षा भूमि लंदन, दीक्षा भूमि नागपुर, महापरिनिर्वाण भूमि दिल्ली और चैत्य भूमि (जहां उनका अंतिम संस्कार हुआ) मुंबई को पंचतीर्थ में जोड़ा है।

खास बात यह है कि इससे पहले आज महू में कमलनाथ ने कहा था कि संविधान निर्माता की जन्मस्थली पर भी शिवराज झूठ बोलते हैं। वे झूठी घोषणाएं करते हैं। कई बार कह चुके हैं। बाबा साहब के नाम पर पंच तीर्थ बनाएंगे, लेकिन आज तक नहीं बनाया। मप्र में सात महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव से भी इस जमावड़े का परोक्ष नाता जुड गया है। अखिलेश यादव व चंद्रशेखर का आना इसकी झलक माना जा रहा है। यहां गैर भाजपा कांग्रेस वाले तीसरे मोर्चे के ऐलान की भी सुगबुगाहटें हैं।

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17 फीसदी वोट, 7 महीने बाद चुनाव!

दरअसल मप्र में करीब 17 फीसदी वोट दलित समाज के हैं। यह 80 लाख से ज्यादा हैं। लिहाजा भाजपा व कांग्रेस समेत अन्य दल भी इसे अपनी तरफ झुकाने की कोशिश में लगे रहते हैं। यह मौका खास इसलिये है कि कुछ ही महीने बाद चुनाव होने वाले हैं। इसी को ध्यान में रखकर दोनों बड़ी पार्टियां अंबेडकर जयंती के बहाने दलितों (अनुसूचित जाति) को लुभाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही है। मौजूदा राज्य सरकार में तीन मंत्री इसी समुदाय के शामिल हैं जबकि कुछ सांसद भी हैं।

मध्य प्रदेश के बारे में माना भी जाता है कि सत्ता का रास्ता दलित व आदिवासी वोटरों से होते हुए ही गुजरता है। प्रदेश में 82 विधानसभा सीटें इसी वर्ग के लिए आरक्षित हैं. इसमें 35 सीट अनुसूचित जाति और 47 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। यानि 40 फीसदी वोटबैंक यहीं से आता है। पर काबिज होने के लिए इस वर्ग का साथ मिलना बेहद जरूरी है।

पिछले चुनाव के आंकड़ों पर नजर डालें तो आदिवासी क्षेत्रों की सीटों पर कांग्रेस ने कब्जा जमायाथा। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर भी कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर हुआ था। इस बार भाजपा ने आदिवासी वोटों को साधने का अभियान पहले से चलाया हुआ है। कुछ समय पहले मंत्रियों को निर्देश दिये गये थे कि वे दलित बस्तियों में रात गुजारें तथा वहां चौपाल लगाकर लोगों की समस्या सुनें।