भोपाल: राज्य शासन की फटकार के बाद मुख्य वन संरक्षक खंडवा ने 2 साल बाद उन सात वन रक्षकों को बुरहानपुर से हटाया, जिन पर अतिक्रमण माफिया से सांठगांठ का आरोप लग रहा था. इसके पहले तक बुरहानपुर अतिक्रमण समस्या को लेकर बनी 2 साल तक 1988 बैच के आईएफएस अधिकारी की रिपोर्ट सीसीएफ कार्यालय में धूल खा रही थी. सीसीएफ खंडवा आरपी राय तब एक हरकत में आए जब एपीसीसीएफ की रिपोर्ट खबरों की सुर्खियों में आई. 

तत्कालीन एपीसीसीएफ (विकास) ने बुरहानपुर अतिक्रमण समस्या को लेकर एक रिपोर्ट हॉफ वन को 12 दिसंबर 2020 को सौंपी थी. इस रिपोर्ट को मुख्यालय से जनवरी 21 को सीसीएफ कार्यालय को भेजा गया था. तब से अब तक रिपोर्ट सीसीएफ कार्यालय में धूल खा रही थी.

अखबार में रिपोर्ट सौंपने के बाद जब सीसीएफ खंडवा को फटकार लगी, तब धूल जमी फाइलों को खंगाल कर रिपोर्ट निकाली गई. 1 मई को जीसीएफ खंडवा ने  अतिक्रमण माफियाओं से सांठगांठ करने वाले वनरक्षक रजनीश ठाकुर, विजय चौहान, सुरेश अवास्या, शांतिलाल राठौर, डोंगर सिंह कनासे, लक्ष्मण मुजाल्दा और रामकृष्ण कनाडे बुरहानपुर वन मंडल से हटा कर दूरस्थ जगह पदस्थ किया है.

 क्या लिखा था रिपोर्ट में

रिपोर्ट में उल्लेख किया गया था कि  अतिक्रमण माफिया के पीछे वामपंथी विचारधारा वाले कथित सोशल वर्कर का हाथ है. वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी भी पैसा लेकर अतिक्रमण कराते आ रहे हैं. स्थानीय लोगों की बदौलत ही बुरहानपुर में 500 वर्ग किलोमीटर जंगल बचा है. बुरहानपुर में स्थानीय ग्रामीणों को आर्थिक एवं कानूनी मदद देख कर ही अतिक्रमणकारियों को रोका जा सकता है.

अपनी रिपोर्ट में वरिष्ठ आईएफएस अधिकारी ने उल्लेख किया है कि खरगोन और बड़वाह जिले के 50 से अधिक आदिवासी परिवारों द्वारा संगठित होकर अतिक्रमण किया जा रहा है. अतिक्रमण कारी संगठित होकर एक बड़ी रकम जुटाते है और वे कब्जे के लिए बड़ी राशि फॉरेस्ट अधिकारियों-कर्मचारियों को देते हैं. रिपोर्ट में इसका जिक्र घाघराला संयुक्त वन समिति के अध्यक्ष कडू पटेल ( 3 महीने पहले ही निधन हुआ है) के बयान को आधार बनाकर किया है. यहां यह उल्लेख करना उचित होगा कि बुरहानपुर में जमीन की कीमत ₹20 लाख हेक्टेयर है.