मप्र के दूसरे सबसे बड़े प्रशासनिक भवन माने जाने वाले' सतपुडा' में धधकी आग तो ठंडी हो चुकी है, लेकिन सरकार ने अब तक इसे जांचों, बैठकों, मंथन, आडिट की लपटों में झोंक रखा है। अब तक न तो साफ तौर पर कोई जिम्मेदारी तय हो सकी है और न ही यह तय हो सका है कि दस विभागीय मुख्यालयों व करीब डेढ हजार कर्मचारियों वाले भवन में कामकाज कैसे बहाल हो ।
सरकार ने घटना के चार दिन बाद ही भवन के कई हिस्सों को 'खोलने' की बात कह दी थी, भवन की क और ख विंग खोली गई लेकिन आलम यह है कि 10 दिन बाद भी सतपुड़ा की बिजली तक बहाल नहीं हो सकी है। ऐसे में कर्मचारी यदि दफ्तर आते भी हैं तो अंधेरे में कैसे बैठकर काम करें और जल चुके आग के दमघोंटू ऐं का इस उमस व गर्मी में कैसे सामना करें।
'साफ बात' पर टालमटोल
सतपुड़ा भवन के दफ्तर में कामकाज नहीं होने की कोई सूचना भी सरकार ने साझा नहीं की है, लिहाजा कई जिलों से जो लोग इन दफ्तरों में काम के लिये आते हैं, वे या तो भोपाल में अटके हुये हैं या लौट गये हैं। इक्का दुक्का कर्मचारी जरूरी फाइलें लेकर अंधेरे में भटक रहे हैं कि इनका निपटान कैसे हो। आग ने नेशनल इंफॉर्मेशन सेंटर के सरकारी सर्वर को भी ठप कर दिया है। इससे स्कॉलरशिप, पेंशन और अनाज खरीदी जैसे काम ठप हैं। जबकि यही वक्त होता है इन कामों को अंजाम पर पहुंचाने का होता है।
भवन के क्षतिग्रस्त हिस्से पर मंथन
बताया जाता है कि मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस ने क्षतिग्रस्त सतपुड़ा भवन के पश्चिमी विंग के स्ट्रक्चर का अलग से हेल्थ ऑडिट करने को कहा है। नेशनल बिल्डिंग संहिता के मुताबिक यदि किसी भवन में आग की वजह से तापमान 800 डिग्री तक चला जाए तो नुकसान हो सकता है। वहीं यह भी कहा जा रहा है कि राजेश राजौरा की जांच कमेटी ने पाया था कि तापमान 1200 से 1500 डिग्री तक चला गया था।