भोपाल: शिवपुरी की मनिहारी नदी के किनारे स्थित वन्य क्षेत्र को ग्वालियर के महाराजा माधवराव सिंधिया के नाम पर स्थापित माधव नेशनल पार्क को आबाद करने की शुरुआत हुई. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से आए बाघ और बांधवगढ़ नेशनल पार्क से आई बाघिन को बाड़े में रिलीज किया.

पन्ना की तर्ज पर माधव नेशनल पार्क को आबाद करने की शुरुआत हुई किंतु पन्ना से बाघिन नहीं आ सकी. पन्ना पार्क प्रबंधन ने किस बाघिन का चयन किया था उसकी पीठ पर घाव थे, इसलिए ऐन वक्त पर उसे ट्रेंकलाइज नहीं किया जा सका. पन्ना नेशनल पार्क के चंद्रपुर रेंज से दूसरी बाघिन की तलाश शुरू हो गई है.

354 वर्ग किलोमीटर के इस नेशनल पार्क में आजादी के पहले सिंधिया राजघराने की शिकारगाह हुआ करती थी और यहां टाइगर का शिकार करने राजघराने के सदस्य व उनके मेहमान आया करते थे. 1970 में यह नेशनल पार्क टाइगर विहीन हो गया था जहां ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता स्व. माधवराव सिंधिया की इच्छा थी कि फिर से टाइगर का कुनबा शुरू हो. स्वर्गीय सिंधिया की इच्छा के अनुसार उनकी जयंती पर माधव नेशनल पार्क को आबाद करने की शुरुआत हो गई. 

बांघवगढ़ टाइगर रिजर्व से एक बाघिन और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से बाघ को माधव नेशनल पार्क भेज दिया गया है. बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक राजीव मिश्रा व उप संचाक लवि भारती और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक एल कृष्णमूर्ति ने अपने-अपने बाघिन-बाघ को कुछ दिन पहले रेस्क्यू कर इनक्लोजर में मॉनीटरिंग व स्वास्थ्य परीक्षण किया. इसके बाद माधव नेशनल पार्क भेजा है। शुक्रवार को ही माधवराव सिंधिया की जयंती है और उन्हें पार्क में छोड़ा जाएगा.

चयनित बाघिन की पीठ पर घाव थे-

पन्ना टाइगर रिजर्व की स्वस्थ बाघिन को माधव नेशनल पार्क पहुंचाया जाना था, लेकिन पार्क प्रबंधन की लापरवाही से तीन माह पहले की कवायद आज तक पूरी नहीं हो सकी। पन्ना टाइगर रिजर्व के क्षेत्रीय संचालक बृजेंद्र झा के अनुसार जिस बाघिन को भेजना था वह ट्रेस नहीं हुई। जबकि पीसीसीएफ (वन्य प्राणी) जेएस चौहान ने स्पष्ट किया कि अन्ना के जिस बाघिन को माधव नेशनल पार्क लाना था, उसके पीठ पर घाव थे इसलिए कुछ नहीं लाया जा सका. दूसरी चंद्रनगर क्षेत्र में बाघिन की तलाश की जा रही है.

15 दिन बाद शुरू होगी असल चुनौती-

राष्ट्रीय उद्यान के अधिकारियों के अनुसार बाघों को करीब 15 दिनों तक चार हेक्टेयर में बने इन तीन बाड़ों में रखा जाएगा. यदि सब कुछ ठीक रहा तो 15 दिन में बाड़े के गेट खोलकर इसी क्षेत्र में इन्हें छोड़ दिया जाएगा. यहीं से पार्क प्रबंधन की असल चुनौती शुरू होगी. बाड़े महज 4 हेक्टेयर के क्षेत्र में निगरानी के लिए छह मचान बने हैं और कैमरा भी मौजूद रहेंगे.

यहां छोटे क्षेत्र में निगरानी रखना आसान होगा, लेकिन 15 दिन बाद जब बाघों को स्वच्छंद विचरण के लिए छोड़ दिया जाएगा तब इनकी निगरानी चुनौती होगी. रेडियो कालर के जरिए मिलने वाले सिग्नल निगरानी रखने के लिए मुख्य रूप से इस्तेमाल होंगे. इसके बाद करीब एक से दो महीने इंतजार करना होगा कि बाघ अपनी टेरेटरी कहां पर बनाते हैं.