भोपाल: वक्त है बदलाव का, विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का मुख्य स्लोगन था. अब यह स्लोगन कांग्रेस संगठन पर फिट बैठता नजर आ रहा है. सत्ता से हटने डेढ़ साल बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने गुरुवार को नेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. इस इस्तीफे के साथ ही डॉक्टर गोविंद सिंह को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने की घोषणा भी कर दी.

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ पर लगातार एक पद छोड़ने का दबाव बनता रहा पर वे बने रहे. यहां तक की  कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी उन्हें बुलाकर एक पद छोड़ने के लिए कह दिया था. बावजूद इसके, दोनों पदों पर बने हुए थे. पिछले दिनों उनके एक बयान से विधानसभा की सदस्य पर खतरा मंडराने लगा तब उन्होंने गुरुवार को नेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफा दे दिया.

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसे मंजूर कर लिया है. केसी वेणुगोपाल ने इसकी जानकारी दी है. कमलनाथ की जगह अब पूर्व मंत्री डॉ गोविंद सिंह नेता प्रतिपक्ष होंगे. डॉ गोविंद सिंह सात बार के विधायक हैं.  साथ ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं। वह चंबल इलाके से आते हैं. कमलनाथ की सरकार में डॉ गोविंद सिंह मंत्री रहे हैं.

नाथ की गैरमौजूदगी में सदन का मोर्चा संभालते थे डॉक्टर-

डॉ गोविंद सिंह मुखर होकर पार्टी में अपनी बातों को रखते हैं. डॉ सिंह सदन में कमलनाथ की गैरमौजूदगी में घोषित तौर पर नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी संभालते रहे. बीते विधानसभा के सत्र में भी नेता प्रतिपक्ष कमलनाथ सदन की कार्रवाई से हमेशा नदारद रहे.

विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम से लेकर सदन के नेता शिवराज सिंह चौहान तक ने कमलनाथ की गैर हाजिरी पर डॉक्टर गोविंद सिंह को नेता-प्रतिपक्ष बनाने की सिफारिश तक कर दी थी. डॉ सिंह को संगठन के अंदर से भी कई बार उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाने की मांग उठी है. कहा जा रहा है कि कमलनाथ एक पद छोड़कर प्रदेश में अब संगठन की मजबूती पर जोर देंगे.

हर मुलाकात में सोनिया ने एक पद छोड़ने की सलाह दी-

बीते 15 दिनों के अंदर कमलनाथ ने दो बार कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी से मुलाकात की है. इस दौरान कई मुद्दों पर विस्तार से बात हुई थी. संभावना व्यक्त की जा रही है कि शायद आखिरी मुलाकात में उन्होंने इस्तीफे की पेशकश की होगी. दरअसल, कमलनाथ 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले तक दिल्ली की राजनीति करते थे. 2018 विधानसभा चुनाव के कुछ महीने पहले उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाकर भेजा गया था। कांग्रेस ने उनके नेतृत्व में अच्छा प्रदर्शन किया है. 15 साल बाद प्रदेश में सरकार भी बनी लेकिन 15 महीने बाद की गिर गई.

राजनीति की आखिरी पारी में मिला सम्मान-

डॉक्टर गोविंद सिंह कांग्रेस मध्यप्रदेश विधानसभा के सबसे वरिष्ठ विधायक है. डॉ सिंह की राजनीति की आखिरी पारी है. उन्होंने अगला विधानसभा चुनाव लड़ने से मना कर दिया है. आखिरी पारी में कांग्रेस ने देर से ही सही लेकिन उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाकर भरपूर सम्मान दिया. डॉ सिंह ने अपनी राजनीति की शुरुआत जनता दल से की. 1990 में पहली बार विधायक बने. पटवा सरकार के भंग होने के बाद डॉक्टर गोविंद सिंह ने कांग्रेस का दामन थामा. प्रदेश कांग्रेस की गुटीय राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से जुड़े किंतु कभी भी उन्हें इसका लाभ नहीं मिला.

ग्वालियर चंबल संभाग में मिलेगा लाभ-

ग्वालियर-चंबल संभाग की राजनीति में डॉक्टर गोविंद सिंह इकलौते ऐसे नेता है, जिन्होंने कांग्रेस में रहकर सिंधिया ( स्वर्गीय माधवराव और ज्योतिरादित्य सिंधिया ) के मुखालफत की. सिंधिया के लगातार विरोध के बावजूद भी भिंड की राजनीति में उन्हें सिंधिया गुट को पनपने नहीं दिया. नेता-प्रतिपक्ष बनाए जाने से ग्वालियर-चंबल संभाग की राजनीति में कांग्रेस इकलौता नेता है जो सिंधिया के विरोध का सामना कर सकते हैं.