मध्यप्रदेश चुनाव में कांग्रेस ने सांगठननिक स्तर पर जो तैयारी की थी, वह दिखावटी साबित हुई है। भाजपा के संगठन से मुकाबला करने के लिए बूथ, सेक्टर और मंडलम स्तर पर जो समितियां बनाईं वह कहीं टिक नहीं पाईं समितियां पार्टी की बात असरदार तरीके से मतदाताओं तक पहुंचा नहीं सकी और न ही जनता की नब्ज को टटोलने में सफल हुई।
खास बात यह है कि युवा कांग्रेस एक बूथ-दस यूथ बनाने का जो लक्ष्य दिया गया था, उस पर काम भी रस्मी ही रहा। पिछड़ा वर्ग विभाग के अध्यक्ष सिद्धार्थ कुशवाहा अपने निर्वाचन क्षेत्र से बाहर नहीं निकले। युकां अध्यक्ष भी खुद चुनाव लड़ने में व्यस्त रहे। हालांकि, यह दोनों अपना चुनाव जीत गए।
उल्लेखनीय है कि अध्यक्ष कमल नाथ ने संगठन को भाजपा से मुकाबले के तैयार करने के लिए बूथ, सेक्टर और मंडलम पर काम का दावा किया था। हर क्षेत्र में समिति बनाई थीं। वे स्वयं इनकी निगरानी की और दौरों के समय करते थे। हालांकि उनके दौर ही बहुत सीमित रहते थे। उनकी मंशा थी कि संगठन मजबूत रहे ताकि प्रत्याशी कोई भी हो, उसका कोई प्रभाव न पड़े, लेकिन प्रयोग कारगर नहीं हुआ।
वहीं युवा कांग्रेस को प्रत्येक बूथ- दस यूथ की टीम तैयार करने का लक्ष्य दिया गया जो सभी 230 विधानसभा सीटों तक पहुंच ही नहीं पाया । संगठन के प्रदेश अध्यक्ष डा. विक्रांत भूरिया को पार्टी ने झाबुआ से प्रत्याशी बनाया तो वह वहीं सिमटकर रह गए। दूसरी तरफ भाजपा की बूथ प्रबंधन टीम निर्धारित दिशा में काम करती रही। प्रत्याशी के स्थान पर उन्होंने पार्टी का मत प्रतिशत बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया। इसका लाभ भी मिला और पार्टी को वोट प्रतिशत 42.01 से बढ़कर 48.55 प्रतिशत हो गया। जबकि, कांग्रेस का वोट प्रतिशत 40.89 से घटकर 40 प्रतिशत ही रह गया।