अब पीएम इमरान खान व उनकी सरकार की विदाई के बाद जब आज पाकिस्तान को नया पीएम मिल गया है तो इस मुल्क के भीतर चल रही सियासी उथल पुथल ही नहीं बल्कि जनता के मन की बात पर भी नयी सरकार को गौर करना होगा और ईमानदारी से करना होगा..!

 सर्वोच्च अदालत ने एक एक बेहतर फैसला सुनाते हुए वहां लोकतंत्र को मजबूत करने की बड़ी पहल की है। इसका समाधान होना चाहिये। खास बात यह है कि न केवल इमरान सरकार, बल्कि देश के राष्ट्रपति के फैसले को भी सुप्रीम कोर्ट ने पलटकर न्याय के प्रति अपने लोगों में विश्वास को बढ़ाया है। इमरान अपने देश के सफलतम क्रिकेट कप्तान रह चुके हैं और उन्होंने कहा था कि वह आखिरी गेंद तक खेलेंगे। उन्होंने कोशिश भी की लेकिन इन कोशिशें में भरोसा कम था क्योंकि पूरा विपक्ष उनके खिलाफ लामबंद था और खुद उनके दल के लोग भाग रहे थे।

 इमरान खान ने बहुमत जुटाने के लिए चमत्कार के दावों के बीच हार मान ली, मतदान में बहुमत उनके पक्ष में नहीं था। सभी विशेषज्ञ एकमत थे कि इमरान खान पाकिस्तानी संसद में हार जाएंगे, क्योंकि उनके पास सिर्फ 142 सांसद हैं, हालांकि जब अविश्वास पर मतदान हुआ तो यह संख्या कुछ अधिक रही। वैसे तो संसदीय लोकतंत्र परिपक्वता की मांग करता है, लेकिन जिस तरह से पाकिस्तान में इमरान सरकार ने खुद को बचाने के लिए संसद को भंग कराया, उससे बहुत त्रासद स्थिति बन गई थी। जब सरकार को पता था कि वह बहुमत में नहीं है, तब संसद भंग करने की सिफारिश किसी भी लोकतंत्र में निंदनीय कार्य है। एक सबक यह भी है कि किसी भी सरकार को बाहरी ताकतों की साजिश के बहाने बचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। 

अगर पाकिस्तान के संविधान में यह अतार्किक कमी है, तो उसे दूर करने का प्रयास नयी सरकार को करना चाहिए। यह भी सामने आया कि वह बतौर पीएम सफल नहीं रहे, उन्होंने जो वादे किये थे वह भी पूरे नहीं कर सके। वे कहते रहे कि अमेरिका उन्हें हटाना चाहता है लेकिन इसके कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं, वहीं सेना ने भी इमरान से अपना समर्थन तटस्थ होकर खींच ही लिया था। कई बार लगता है, पाकिस्तान के नेता अभी उतने लोकतांत्रिक नहीं हुए हैं, जितना उन्हें होना चाहिए था। उसका लोकतंत्र नया नहीं है, उसे अभी भी आदर्श या ज्यादा समझदार नेताओं की तलाश है। कहीं न कहीं पाकिस्तानी लोकतंत्र को अभी भी चंद नेता अपने हिसाब या मर्जी से हांक रहे हैं।

 यह साफ है कि इमरान को हटाने वाला विपक्ष भी पाकिस्तान में बेदाग नहीं है। भुट्टो परिवार हो या शरीफ परिवार, दोनों के दामन पर बेहिसाब दाग हैं। हालांकि, इन परिवारों की नई पीढ़ी की परख अभी होना बाकी है। शायद उसका वक्त भी आ गया है। बहरहाल, पाकिस्तान की सरकार सेना को मिलकर नयी पहल करनी होगी, वहां के आम लोगों का जीवनस्तर सुधारना होगा और किसी भी अन्य ताकतवर मुल्क के बहकावे या मदद के फेर में फंसे बिना अपने विवेक से अपने मुल्क के बारे में फैसले करने होंगे। भारत के लिये पाकिस्तान किसी जरूरत के नजरिए से महत्वपूर्ण नहीं रहा है लेकिन एक पड़ोसी के नाते भारत को यह उम्मीद रहती है कि वह कोई तनाव पैदा न करे। यही बात पाकिस्तान की सरकार को सोचना होगी कि वह अपने वास्तविक पड़ोसी से बेहतर राब्ता रखे।