भोपाल। प्रदेश में अब चम्बल के बीहड़ों का उपयोग क्षतिपूरक वनीकरण के लिये होगा। राज्य सरकार ने इस संबंध में निर्णय लेकर जल संसाधन विभाग को कहा है कि चंबल के बीहड़ों में बड़े पैमाने पर शासकीय भूमि रिक्त एवं उपलब्ध है जिसका उपयोग नहीं हो रहा है। जल संसाधन परियोजनाओं के क्रियान्वयन के दौरान क्षतिपूरक वनीकरण के लिये यदि वन विभाग को इस प्रकार की भूमि आवंटित की जाती है तो ऐसी भूमि अस्वीकार करने के बजाये उक्त भूमि को वनीकरण हेतु किस प्रकार उपयोग किया जा सकता है, इसकी योजना बनाई जाये।

दरअसल जल संसाधन विभाग की अनेक परियोजनाओं में वन भूमि आती है तथा उसे लेने के लिये वन विभाग एवं केंद्र से वन संरक्षण कानून के तहत अनुमति लेनी होती है। अनुमति मिलने पर परियोजना के लिये ली गई वन भूमि के बदले अलग स्थान पर राजस्व भूमि वनीकरण हेतु वन विभाग को देनी होती है। चूंकि चम्बल के बीहड़ खाली पड़े हुये हैं और राजस्थान जैसे रेतीले क्षेत्र में क्षतिपूरक भूमि दी जाती है, इसलिये अब इसके उपयोग की पहल की गई है। वन संरक्षण कानून के तहत क्षतिपूरक भूमि पर एक हजार पौधे प्रति हैक्टेयर की शर्त रहती है जो चम्बल जैसे बीहड़ों में संभव नहीं है। इसीलिये जल संसाधन विभाग ने वन विभाग के माध्यम से केंद्र सरकार को प्रस्ताव भिजवाया है कि वे बीहड़ के लिये शर्तों में रियायत दे एवं इसके क्षतिपूरक वनीकरण उपयोग हेतु अनुमति प्रदान करे।

विभागीय अधिकारी ने बताया कि चंबल के बीहड़ों का क्षतिपूरक वनीकरण हेतु उपयोग के लिये केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा गया है। वहां से अनुमति मिलने पर आगे की कार्यवाही की जायेगी।