पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए सदमे की तरह हैं. पांच राज्यों के चुनाव में गांधी परिवार के नेतृत्व वाली कांग्रेस की सबसे शर्मनाक पराजय हुई है. यहां तक की उत्तर प्रदेश में गांधी परिवार की प्रियंका गांधी के नेतृत्व में भी कांग्रेस अपना वोट प्रतिशत नहीं बना सकी. लंका गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस का वोट प्रतिशत घटकर 2.33% रह गया. कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के निर्णय का नतीजा पंजाब कांग्रेस को भुगतना पड़ा. राहुल गांधी अपनी जिद में न नवजोत सिद्धू को अध्यक्ष बनाते और न पंजाब में भी कांग्रेस की अप्रत्याशित हार भी है. पंजाब में कांग्रेस के पक्ष में माहौल था किंतु सिद्धू और चन्नी की लड़ाई में पंजाब में कांग्रेस का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन रहा. देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए पहला झटका नहीं है. 2014 से कांग्रेस लगातार चुनाव हारती आ रही है. लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि वह अपनी गलतियों को दूर करने के बजाए उन्हें दोहराती आ रही है. चुनाव नतीजों से गांधी परिवार न तो सीख लेती है और न ही चुनाव जीतने की ललक दिखाई देती है. गांधी परिवार को अब कांग्रेस संगठन की बागडोर पार्टी के किसी और वरिष्ठ नेता के हाथ सौंप देना चाहिए.
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अब सवाल उठता है कि कांग्रेस की बागडोर गांधी परिवार के पास नहीं तो फिर किसके हाथों में? यह सवाल पूरे देश के कांग्रेस नेताओं के मानसिक पटल पर उठ रहा है.
*क्या कमलनाथ हाथ में संगठन की बागडोर हो*
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राहुल गांधी पूरे देश में जनता का विश्वास जीतने में असफल हो गए हैं. ऐसे में कांग्रेस में नए अध्यक्ष की खोज करना एक प्रसांगिक आवश्यकता बन गई है. कांग्रेस के निष्ठावान एवं वरिष्ठ नेता की माने तो कांग्रेस की बागडोर के लिए 2 नाम सुझाए हैं. पहला नाम कमलनाथ का है, जोकि गांधी परिवार के लिए हमेशा से निष्ठावान रहे हैं. नहीं नहीं, बल्कि उन्हें इंदिरा गांधी का तीसरा पुत्र भी कहा जाता है. कांग्रेस के एकमात्र नेता कमलनाथ है, जिनकी छवि पूरे देश में है. कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं का गिरोह (जी-23) को भी कांग्रेस संगठन में काम करने के लिए कामयाब हो सकते हैं. यही नहीं, विपक्ष के नेताओं शरद पवार, ममता बनर्जी, बीएसपी सुप्रीमो मायावती के अलावा दक्षिण के नेताओं के साथ भी अच्छे है. यही नहीं बल्कि राजघरानों से भी उनके दोस्ताना रिश्ते हैं. चाहे वह अदानी हो या फिर अंबानी. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में कमलनाथ ही एकमात्र नेता हैं, विपक्षी नेताओं को गोलबंदी करने में सफल भी हो सकते हैं. कमलनाथ के पास अपनी टीम है, दो इलेक्शन के सर्वे से लेकर प्लानिंग तक तैयार करती है. यह बात अलग है कि कमलनाथ की प्लानिंग पर कांग्रेस के नेता एवं कार्यकर्ता इमानदारी से क्रियान्वयन नहीं कर पाते हैं.
कमलनाथ के अलावा दूसरा नाम गुलाम नबी आजाद का लिया जा रहा है. गुलाम नबी आजाद की छवि पूरे देश धर्मनिरपेक्ष और गुटनिरपेक्ष की है. गुलाम नबी आजाद पर भी कोई आरोप नहीं है किंतु उनके अध्यक्ष बनने पर कांग्रेस पर मुस्लिम वाद का आरोप बीजेपी मढ़ने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखेगी. यही वजह है कि कांग्रेस नेताओं की एक लंबी फेहरिस्त जो गुलाम नबी आजाद को पसंद नहीं करती है. एक नाम और आता है दक्षिण नेता पी चिदंबरम का. पी चिदंबरम पर लगे सारे आरोपों के चलते पार्टी के कई वरिष्ठ नेता उनके नाम से सहमत नहीं है.
*उत्तर प्रदेश में क्यों हारी कांग्रेस*
पार्टी की कोर टीम में फेरबदल करने की वजह से यूपी के कई वरिष्ठ नेता प्रियंका से नाराज हो गए. क्या उनका यह फैसला सही था? कई कांग्रेसी नेताओं के पार्टी छोड़ने के लिए कोर टीम को दोषी ठहराया गया. ये सभी नेता विधानसभा चुनाव के लिए अपने को अपमानित और उपेक्षित महसूस कर रहे थे. इनमें ललितेश त्रिपाठी, आरपीएन सिंह, जितिन प्रसाद और अनु टंडन शामिल है. प्रियंका के निजी सचिव संदीप सिंह और यूपी कांग्रेस प्रमुख अजय कुमार लालू पर भी आरोप लगे. इन दोनों के ग्राउंड फीडबैक सच्चाई से कोसों दूर थे.
कहा जाता है कि संदीप सिंह पर प्रियंका की पूरी निर्भरता से पार्टी के कार्यकर्त्ता और नेता नाराज हो गए. सिंह के क्रूर व्यवहार और प्रियंका तक किसी भी तरह की पहुंच पर उनके नियंत्रण के बारे में कई शिकायतें मिलीं. आम लोगों के लिए उनसे मिलना लगभग असंभव हो गया. हकीकत है कि संदीप सिंह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष हैं. वे पार्टी में वामपंथी कार्यकर्ताओं को शामिल करने पर जोर देते रहे, जिसका असर पार्टी कार्यकर्ताओं पर अच्छा नहीं हुआ.
*अब गुजरात और कर्नाटक में कैसा होगा प्रदर्शन?*
उत्तर प्रदेश चुनाव फतह करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात पहुंचे. गुजरात विधानसभा चुनाव को लेकर अपनी चुनावी रणनीति तेज कर दी है. गुजरात और कर्नाटक में जून - जुलाई में विधानसभा के चुनाव होने की संभावना है. सवाल उठता है कि पांच राज्यों में मिली शर्मनाक पराजय के बाद कांग्रेस को हार की हताशा से उबरने के लिए कई महीने लगेंगे. गुजरात और कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन इसी तरह रहा तो वह राज सभा में भी विपक्ष नेता का दर्जा खो देगी. कांग्रेस में अभी पूर्णकालिक अध्यक्ष भी नहीं है ऐसे में गुजरात और कर्नाटक चुनाव फतह करने की रणनीति कब तक बनेगी यह अभी संशय में है.