भोपाल: राज्य शासन ने जल संसाधन विभाग के एक उपयंत्री का वह आवेदन जिसमें उसने भूख से मरने की नोबत आने का जिक्र किया है तथा अनुकम्पा भत्ता देने की मांग की है, निरस्त कर दिया है।
दरअसल वर्ष 1986-87 एवं 87-88 में राहत कार्य के अंतर्गत शाजापुर जिले में 138 स्टाप डेमों के निर्माण कार्य हेतु तत्कालीन कलेक्टर शाजापुर द्वारा रूपये 5 करोड़ 18 लाख रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति दी गई थी। उक्त कार्यों में भ्रष्टाचार संबंधी सूचना प्राप्त होने पर राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो भोपाल द्वारा 20 जुलाई 1989 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम एवं भादवि की धारा 420, 120 बी के अंतर्गत अपराध पंजीबद्ध यिा था।
विवेचना उपरांत दोषी अधिकारियों/कर्मचारियों के विरूद्ध विशेष न्यायालय शाजापुर में 11 जनवरी 1999 को चालान प्रस्तुत किया गया। शासकीय सेवक के विरूद्व न्यायालय में चालान पेश होने के फलस्वरूप तत्कालीन उपयंत्री विलास पारूलकर को 2 फरवरी 1999 को निलंबित किया गया।
विशेष न्यायाधीश शाजापुर द्वारा 30 जनवरी 2018 निर्णय देकर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत 2 वर्ष के सश्रम कारावास एवं 500 रुपये के अर्थदण्ड से दण्डित किया गया। इस पर तत्कालीन उपयंत्री विलास पारूलकर को 22 मार्च 2019 सेवा से पदच्युत कर दिया गया।
पदच्युत किये जाने के दण्डादेश के विरूद्ध विलास पारुलकर द्वारा अनुकंपा भत्ता प्रदान किये जाने हेतु उच्च न्यायालय खण्डपीठ इन्दौर में याचिका दायर की गई, जिस पर हाईकोर्ट ने 12 नवम्बर 2021 को निर्णय दिया कि मेरिट के आधार पर राज्य शासन इस दण्डादेश पर विचार करे।
पारूलकर द्वारा अपने अभ्यावेदन में मुख्यत: लेख किया गया कि उनके द्वारा 39 वर्ष की सेवा करने के उपरांत भी उनका जीवन बर्बाद हो गया है तथा भूखे मरने की नौबत आ गयी है, बलहीन हैं क्योंकि विभाग द्वारा अपराधिक प्रकरण में न्यायालय के निर्णय एवं नियमों के अंतर्गत ही उन्हें दण्डित किया गया है।
इस पर अब राज्य शासन ने निर्णय दिया है कि विलास पारूलकर द्वारा स्टाप डैमों के निर्माण कार्य में भ्रष्टाचार किये जाने पर अपराधिक प्रकरण में न्यायालय द्वारा उन्हें सजा एवं अर्थदण्ड दिये जाने के पारित निर्णय के परिप्रेक्ष्य में शासन द्वारा उन्हें सेवा से पदच्युत किये जाने का दण्ड अधिरोपित किया गया है। इसलिये राज्य शासन उनका अनुकम्पा भत्ता देने का अभ्यावेदन निरस्त करता है।