पुलिस की जरूरत किसी भी वक्त और किसी बहुत महत्वपूर्ण होती है। समाज की मूल जरूरत में से एक बेहतर पुलिसिंग ही है। लेकिन इसकी कार्यप्रणाली को लेकर अक्सर समाज से ही शिकायतों के स्वर उठते रहते हैं। हाल में प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय रक्षा यूनिवर्सिटी के पहले दीक्षांत समारोह में कहा है कि देश में पुलिस सुधारों का एजेंडा लंबे समय से पेंडिंग है। आजादी के तत्काल बाद ही पुलिस की कार्यप्रणाली में व्यापक सुधार किए जाने की जरूरत थी क्योंकि अंग्रेजी राज में आंतरिक सुरक्षा तंत्र के गठन और संचालन के पीछे मूल उद्देश्य आम लोगों में भय उत्पन्ना करना था।

आजाद देश में पुलिस बल और आम लोगों के बीच इस तरह के रिश्ते की कोई वजह नहीं थी। बावजूद इसके पुलिस बलों का ढांचा पहले जैसा ही रहा और उसकी कार्य प्रणाली में भी कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री का यह कहना ही महत्वपूर्ण है कि पुलिस का रवैया समाजविरोधी तत्वों के प्रति सख्त और समाज के प्रति नरम होना चाहिए। मगर दुर्भाग्य यह है कि कई बार इसके उलट देखने को मिल रहा है, दरअसल पुलिस बलों का आधुनिकीकरण तो होना ही चाहिए, उनके नियमित ट्रेनिंग की भी व्यवस्था होनी चाहिए। सबसे ज्यादा जरूरी है

पुलिस बलों में प्रोफेशनलिज्म को स्थापित करना तथा हर स्तर पर उसमें वर्क कल्चर विकसित करना। लेकिन पुलिस से इस अपेक्षा के साथ सरकार का भी एक उत्तरदायित्व बनता है, वह है पुलिस पुलिस बलों में एक हद तक स्वायत्तता सुनिश्चित की जाना। ताकि पुलिस को रोज के कार्यों में राजनीतिक दखलंदाजी का सामना नहीं करना पड़े । हालांकि उच्च पदों पर नियुक्ति और कार्यकाल को लेकर कुछ गाइडलाइंस हाल में बनाई गई हैं, लेकिन इस दिशा में अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है।

कुछ महीने पहले ही बेहद पेशेवर मानी जाने वाली मुंबई पुलिस के हाल के घटनाक्रम पर नजर डालें तो पुलिस इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी पर पद के दुरुपयोग और सौ करोड रुपये महीने की वसूली के आरोप लगे पुलिस कमिश्नर रहे व्यक्ति ने कहा कि उसका पुलिस फोर्स पर विश्वास नहीं है। जब मुंबई पुलिस का यह हाल है तो अन्य क्षेत्रों की पुलिस की चर्चा ही क्या की जाए जहां पोस्टिंग और ट्रांसफर में जातिवाद, भ्रष्टाचार की शिकायतें आम हैं। पुलिस सुधार के सवाल इन सब मसलों से जुड़े हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री द्वारा इस ओर ध्यान खींचे जाने के बाद अब यह प्रक्रिया तेज होगी। लेकिन एक और पहलू है, जिस पर ध्यान देने की जरूरत है, वह है पुलिस की छवि। हालांकि प्रधानमंत्री ने ठीक कहा कि मीडिया में पुलिस को जिस तरह से पेश किया जाता है वह उचित नहीं है, लेकिन मूल बात यह याद रखने की है कि पुलिस या किसी भी संस्था की छवि सबसे ज्यादा किसी चीज से तय होती है तो वह है उसका अपना आचरण ।

मीडिया में भी यही प्रतिबिंबित होता है। लिहाजा पुलिस के आचरण में सुधार किए बगैर यदि सिर्फ मीडिया में पेश होने वाली तस्वीर को बदलने की कोशिश की गई तो कोई खास फायदा होने वाला नहीं हैं। सबसे पहले पुलिस के काम को भी साफ तौर पर वर्गीकृत करना होगा, यानि वीवीआईपी ड्यूटी, सुरक्षा और कानून व्यवस्था से लेकर जांच आदि के कामकाज में साफ तौर पर वर्गीकरण होना चाहिये, क्योंकि कई बार पुलिस अफसर भी राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिये कुछ ऐसा कर जाते हैं या करने पर मजबूर हो जाते हैं कि समाज उसे बरसों तक याद रखता है। और छवि बेहतर हो नहीं पाती।