युद्ध थमने के आसार नहीं दिख रहे हैं, विश्व में गोल बंदी दिखने लगी है | यूक्रेन, ४.४ करोड़ स्वतंत्र नागरिकों वाला राष्ट्र, जो आज बहादुरी से अपनी आज़ादी बरकरार रखने की खातिर पुतिन के रूस से लड़ाई लड़ रहा है|इस घटना ने विश्व शांति बनाए रखने में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका, सार्थकता और मध्यस्थता क्षमता पर खड़े होने वाले महत्वपूर्ण प्रश्नों को पुनः उभारा है। दिनों-दिन बढ़ता जा रहा युद्ध संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था में सुधार लाने की त्वरित जरूरत को रेखांकित करता है | इसी गोल बंदी के तहत अमेरिका एवं उसके अन्य सहयोगियों ने यूक्रेन को अतिरिक्त सैन्य मदद की बात कही और भी देश इस युद्ध में प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष रूप से शामिल हो रहे हैं ।

सही मायने में पुतिन ने संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र के सर्वप्रथम सिद्धांत का सरासर उल्लंघन है। मध्य यूरोप के नक्शे में क्षेत्रीय सीमा रेखा पुनर्निमित करने की रूसी महत्वाकांक्षा और अपनी भू-राजनीतिक हदों का पुनर्निधारण करने की इस चाहत का इस २१ वीं सदी में कोई औचित्य नहीं है। पूर्व सोवियत संघ की महाशक्ति वाले रुतबे से प्रेरित होकर क्रूर रूसी सेना के हमलों से एक संप्रभुता संपन्न राष्ट्र अपनी पहचान खो देगा, यह नीति-आधारित विश्व-व्यवस्था की मान्यताओं की परीक्षा है। रूस की यूक्रेन पर चढ़ाई का अंजाम वैश्विक राजनीतिक स्थिरता पर पड़ेगा। इस घटना ने विश्व शांति बनाए रखने में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका, सार्थकता और मध्यस्थता क्षमता पर खड़े होने वाले महत्वपूर्ण प्रश्नों को पुनः उभारा है। जिनमे ‘संख्या के आधार पर बहुमत’ वालों की आकांक्षा को ‘बलशाली अल्पसंख्यक’ वीटो नामक बेजा शक्ति का इस्तेमाल भी है |

यह रूसी दलील चतुराई से भरी है कि वह आत्मरक्षार्थ यूक्रेनियों को ‘हथियार मुक्त करके असैन्यीकरण’ करने का प्रयास कर रहा है। वह अपने हमले को विशेष ‘सैन्य अभियान’ का नाम देकर, पूर्व सोवियत गणराज्यों को अमेरिका-नीत नाटो पाले में जाने से बचाने का उपाय भी कर रहा है। यह रूस के खोए प्रभामंडल को पुनः पाने का प्रयोजन है। प्रतिशोध से सराबोर पुतिन की चाहत है, रूस का पुराना वैभव कायम करना |

पुतिन दावा करते हैं कि यूक्रेन को रूस से पृथक राष्ट्र की तरह नहीं लिया जा सकता और यह १९९१ के बाद का ‘ऐतिहासिक अनौचित्य’ है, साथ ही उनकी यह दर्पपूर्ण चुनौती है ‘किसी अन्य देश द्वारा दखलअंदाजी का प्रयास ऐसे परिणाम पैदा करेगा, जो इससे पहले आपने कभी न देखे हों।’ इससे यूरोप में इससे वर्षों पहले दफन हो चुके इलाकाई संघर्ष जी उठेंगे और यह स्थिति राष्ट्रों के बीच एक-दूसरे पर आर्थिक निर्भरता से उपजी समझदारी से बनी अंतर्राष्ट्रीय शांति को भंग कर सकती है। यूक्रेन संघर्ष के परिणाम कुछ और देशों को उकसायेंगे कि वे अपनी क्षेत्रीय अखंडता पर खतरा कम करने हेतु परमाणु अस्त्रों को परम-उपाय मानकर हर हाल में हासिल करें। इससे परमाणु निरस्त्रीकरण प्रक्रिया को धक्का लगेगा और विश्व में शांति के प्रयास प्रभावित होंगे |विश्व शांति बनाए रखने में अपना वजूद सिद्ध करने के लिए अक्सर ऐसा होता रहा है।

संयुक्त राष्ट्र की आम सभा और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा समिति में हुई बहसें युद्ध क्षेत्र में शांति बनाने की गवाही देती है। यह सब बार-बार याद दिलाता है कि हम ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जहां नियम-कानून को धता बताने वाली बेलगाम ताकतें हैं, जिन्हें ‘ताकत बदतमीजियां ढांपने के लिए काफी है’ वाले सिद्धांत में यकीन है। सवाल है कि क्या दुनिया पुतिन की युद्ध-आसक्ति की निंदा करने को यथेष्ट आवाज पा लेगी ?

यह सब तो एक न्यायपूर्ण एवं मानवीय विश्व व्यवस्था सुनिश्चित करने की खातिर कड़े उपाय अपनाने से मुंह चुराना निरर्थक है। भारतीय कूटनीति के लिए सिद्धांत और व्यावहारिकता के बीच जितना हो सके संतुलन साधने की चुनौती फिर से उपस्थित है। अपनी आज़ादी और गौरव के रक्षार्थ जूझ रहे यूक्रेनी लोगों के साथ एकजुटता दर्शाने की खातिर संयुक्त वैश्विक इच्छाशक्ति और सभ्य तौर-तरीकों की परीक्षा की घड़ी भी आ गई है |