ज्ञानवापी मामले में गुरुवार को मुस्लिम पक्ष को बड़ा झटका लगा है। अदालत ने ज्ञानवापी परिसर को हिंदुओं को सौंपने, पूजा के अधिकार और मुस्लिम पक्ष के प्रवेश पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका को स्वीकार कर लिया।

ज्ञानवापी मामले में गुरुवार को मुस्लिम पक्ष को झटका लगा है। कोर्ट ने ज्ञानवापी परिसर को हिंदुओं को सौंपने, उन्हें पूजा करने का अधिकार देने और मुस्लिम पक्ष के प्रवेश पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका को स्वीकार कर लिया। विश्व वैदिक सनातन संघ के कार्यकारी अध्यक्ष किरण सिंह द्वारा सिविल जज (सीनियर डिवीजन) फास्ट ट्रैक कोर्ट महेंद्र कुमार पांडेय की अदालत में याचिका दायर की गई थी। मुस्लिम पक्ष ने अब इस दावे पर आपत्ति जताई। कहा गया कि यह मामला सुनने लायक भी नहीं है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर को होगी।

हिंदू पक्ष के वकील विष्णु जैन के मुताबिक यह एक बड़ी कामयाबी है। हमारा मामला पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है। यहां भी 1991 का एक्ट बिल्कुल लागू नहीं होता। हिंदू पक्ष अब 2 दिसंबर को ज्ञानवापी में मिले शिवलिंग की पूजा का अधिकार और परिसर का एक और सर्वेक्षण करने की मांग करेगा।

इससे पहले जिला न्यायलय ने भी ज्ञानवापी श्रृंगार गौरी मामले की सुनवाई का रास्ता साफ करते हुए मुस्लिम पक्ष की याचिका खारिज कर दी थी। अब माना जा रहा है कि मुस्लिम पक्षकार भी आज के फैसले के खिलाफ जिला सत्र न्यायालय में जाएगा।

गौरतलब है कि वादी किरण सिंह ने 24 मई को वाराणसी के जिलाधिकारी, पुलिस आयुक्त, अंजुमन इंतेजामिया समिति के साथ-साथ विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट को प्रतिवादी के रूप में नामित करते हुए एक मुकदमा दायर किया था। बाद में 25 मई को जिला अदालत के न्यायाधीश एके विश्वेश ने मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया था।

अपनी याचिका में, वादियों ने ज्ञानवापी परिसर में मुसलमानों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने, परिसर को हिंदुओं को सौंपने और परिसर में पाए जाने वाले कथित शिवलिंग की नियमित रूप से पूजा करने का अधिकार देने की मांग की थी। मुस्लिम पक्ष ने दावे की स्थिरता पर सवाल उठाया और कहा कि यह 1991 के पूजा अधिनियम के तहत बनाए रखने योग्य नहीं है।

इससे पहले सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के कोर्ट के आदेश पर इसी साल मई में ज्ञानवापी श्रृंगार गौरी परिसर का वीडियोग्राफी सर्वे किया गया था। इस बीच, ज्ञानवापी मस्जिद के वजूखाने में एक आकृति मिली। हिंदू पक्षकार ने इसे शिवलिंग बताते हुए कहा कि इसके साथ आदि विश्वेश्वर प्रकट हुए हैं। दूसरी ओर, मुस्लिम पक्ष ने तर्क दिया कि यह एक फव्वारा था, मुगल-काल की इमारतों में इस तरह के फव्वारे आम थे।