अपने प्रदेश के ताजा हालात पर यदि हम चिंतन करें तो वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लगातार 17 वर्षों तक मुख्यमंत्री रहने का अपना रिकॉर्ड तो कायम कर लिया, लेकिन प्रदेश की आर्थिक ,सामाजिक ,सांस्कृतिक और शैक्षणिक संरचना को वे उन ऊंचाइयों तक नहीं ले जा पा रहे हैं जहां इस दौर में इसे होना था।
किसी भी राज्य में विकास का पैमाना वहां के निवासियों का रहन- सहन उनकी वैचारिक क्षमता और रोजगार से मिली आय से तय की जाती है...मध्यप्रदेश में आज 65 वर्ष के मुहाने बैठ चिंतन करें तो तस्वीर बदरंग नजर आती है..
विकास एक सतत प्रक्रिया है...पाषाण युग से आधुनिक युग तक आते-आते हमने कई सोपान तय किये ...सरकारों के योगदान को झुठलाया नहीं जा सकता लेकिन विकास मनुष्य की स्वयं के द्वारा किये जाने वाले कर्म की पराकाष्ठा की परिणति है....जब मध्य प्रदेश का युवा उच्च शिक्षा और रोजगार के लिए दूरस्थ शहरों की ओर ताकता है तब विकास के दावे भरने वाली सरकारों को शर्म से सर झुका लेना चाहिए।
सबसे पहले मध्य प्रदेश के आर्थिक हालात पर हम बात करें तो वर्तमान में मध्यप्रदेश पर कर्ज का बोझ बढ़कर इस वित्तीय वर्ष में 2.52 लाख करोड़ से भी ऊपर जा पहुंचेगा, अभी यह कर्ज 2.31 लाख करोड़ है, जबकि साल 2021-22 का कुल बजट ही 2.41 करोड़ 375 करोड़ है, जबकि उसमें करीब 50, 938 करोड़ का राजकोषीय घाटा दिखाया गया है. पेट्रोल-डीजल-रसोई गैस की महंगाई की मार से कराह रही जनता को राहत तो दूर की कौड़ी रही, क्योंकि इसकी झलक तो बीते मंगलवार को बजट के पेश होने के एक दिन पहले पेश आर्थिक सर्वेक्षण में दिख गई थी, जिसने राज्य की कंगाली की तस्वीर को सामने लाकर रख दिया था. बेशक किसी भी राज्य के विकास में बाजार से कर्ज लिया जाना एक अनिवार्य कदम होता है लेकिन बदले में उस प्रदेश में विकास का वह सेंसेक्स नहीं छू पा रहा है जहां उसे होना चाहिए।
राज्य की अधोसंरचना भी मंथर चल रही हैं। बड़े महानगरों दिल्ली मुंबई कोलकाता चेन्नई से आवागमन के साधनों की प्रचुरता नहीं है, और ना ही औद्योगिक पटल पर कोई उपलब्धि दिखा सका। मध्य प्रदेश तकरीबन एक दर्जन इन्वेस्टर्स समिट करने के बाद भी शिफर पर हैं।
जिस मध्यप्रदेश को आजादी से पहले ही दुनिया भर में कपडों के बड़े उत्पादनकर्ता के रूप में जाना जाता था, कॉटन किंग के नाम से विश्व विख्यात सेठ हुकुमचंद इंदौर से कपड़ा बनाकर लंदन तक भेजा करते थे और अंग्रेजों से स्पर्धा करने की ताकत उनमें थी ,बिना किसी बड़ी अधोसंरचना और सुविधाओं के वह हाथियों के जरिये माल ढो कर मुंबई से जहाज के द्वारा लंदन पहुँचाने का माद्धा रखते थे ,उस शहर की तमाम कपड़ा मिलें खामोश कर दी गई ....पाॅवरलूम भी बंद होते गए और सरकारें केवल इन्वेस्टर्स समिट करती रही ...समिट के नाम पर भी लाखों करोड़ों रुपया मार्केटिंग पर खर्च हुआ नतीजा एक भी बड़ी इंडस्ट्री मध्यप्रदेश में नहीं है, अम्बानी सत्कार करवाते रहे, मगर उद्योग नहीं लाये.....अलबत्ता इन्वेस्टर्स समिट ने कई नए बिजनेस टायकून को कागजी एग्रीमेंट पर बेशकीमती जमीनों का मालिक बना दिया।
लाखों करोड़ों रुपए सड़कों के नाम पर बहा दिये...सरकारों ने सड़क पानी बिजली के मुद्दे पर चुनाव तो जीते,मगर जनता के दिल नहीं जीत सके। बीते दो दशकों में अधिकांश शहर पेयजल और विद्युत आपूर्ति से जूझ रहे है । पेट्रोलियम पदार्थों में हम सभी राज्यों के सिरमौर इस लिये है कि सर्वाधिक करारोपण करते हैं वो भी बड़ी बेशर्मी के साथ ।
अब बात करते हैं शिक्षा की, मध्यप्रदेश में व्यापम जैसा कांड बीते 65 वर्षों का सबसे बड़ा घोटाला बना, जिसने दुनिया में मप्र को शर्म सार किया। जिस मध्यप्रदेश में योगेश्वर श्रीकृष्ण का शैक्षणिक गौरव हांसिल रहा , जिसकी पहचान विक्रम विश्वविद्यालय, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, डॉ. हरि सिंह गौर विवि जैसे अनगिनत बड़े शैक्षणिक संस्थानों का दुनिया भर में नाम रहा हो वहां पर एक प्रोफ़ेसर सब्बरवाल की मौत और व्यापम जैसा घटनाक्रम राज्य के उन्नत भाल पर बड़ा कलंक साबित हुआ...विद्यार्थियों का भविष्य चौपट होना, राजनीतिक सुरमाओं का बच निकलना यह स्पष्ट करता है कि शैक्षणिक गतिविधियां भी अपने अधोगति की तरफ जा रही है।
अब बात कर लेते हैं स्वास्थ्य व्यवस्था की ,जो राज्य अपने 65 साल के सफर में बेहतर चिकित्सा प्रबंध छोड़ मूलभूत सुविधाओं के लिये भी दिल्ली मुंबई जैसे शहरों की ओर भागता हैं, उसे विकास की दौड़ से दूर करता हैं। हाल ही में जब ग्लोबल पेंडेमिक कोविड आया तो पोल खुली, राज्य की स्वास्थ सेवाएं चरमरा उठी थी , केवल इंदौर के कार्पोरेट हॉस्पिटल की तरफ ही लोग भागे...सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाएं नहीं के बराबर थी, क्या इतने वर्षों में स्वास्थ्य के नाम पर केवल कागजी ख़ानापूर्ति ही हो रही थी, पैरामेडिकल स्टाफ की कमी, ऑक्सीजन का एक भी प्लांट न होना,जरूरी जीवन रक्षक दवाओं के लिए हमें दूसरे राज्यों पर निर्भर रहना पड़ा।
अब चर्चा सांस्कृतिक संपदा की ।
कहते हैं किसी राज्य की प्रगति में उसकी सभ्यता और संस्कृति का प्रवाह बड़ा कारण होता हैं। मध्यप्रदेश में कहने को कालिदास अकादमी, उज्जैन जो महाकवि कालिदास हमारी राष्ट्रीय विरासत के महानतम भण्डार के रूप में ज्ञात हैं। वे आज भी भारतीय संस्कृति के महानतम प्रतिनिधि के रूप में प्रकाशमान हैं। उनकी स्मृति को दृष्टिगत रखते हुए म.प्र. शासन के संस्कृति विभाग ने वर्ष 1978 में उज्जैन में कालिदास अकादमी की स्थापना की। उज्जैन में कालिदास अकादमी के पीछे दो उद्देश्य थे, एक तो यह की इस महाकवि, नाटककार कालिदास की स्मृति को कालजयी बनायी रखी जा सके, दूसरा यह की उज्जैन में एक बहुआयामी संस्था को स्थापित किया जाये ताकि कालिदास को केंद्र में रखकर बनाई थी, आज अपने वैभव को तलाश रही हैं। दूसरी
उस्ताद अलाउद्दीन खाँ संगीत एवं कला अकादमी
मध्य भारत कला परिषद् की स्थापना 1952 में ग्वालियर में हुई थी। 1956 में मध्यप्रदेश राज्य बनने के कारण इसका नाम मध्यप्रदेश कला परिषद् का नाम रखा गया। यह नाम 2003 तक प्रचलन में था। वर्ष 2003 में संस्कृति विभाग द्वारा मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद् का गठन किया गया और इसका नाम मध्यप्रदेश कला अकादमी रखा गया। वर्ष 2006 में पूर्व से ही कार्यरत मैहर घराने प्रवृत्तक गायक उस्ताद अलाउद्दीन खाँ के नाम से संचालित संगीत कला अकादमी का विलय कला अकादमी में किया गया। तब से इसका नाम उस्ताद अलाउद्दीन खाँ संगीत एवं कला अकादमी प्रचलन में है। ये भी अपने नाम को खोज रही प्रतीत होती हैं।
तीसरी आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी हैं, मध्य प्रदेश शासन के संरक्षण में आदिवासी लोक कला अकादमी की स्थापना सन 1980 में की गयी। इस अकादमी का मुख्य लक्ष्य व उद्देश्य, जनजातीय कला को प्रोत्साहन, संरक्षण व प्रोत्साहन प्रदान करना है। यह अकादमी सर्वेक्षण संचालित करती है, विभिन्न आयोजन कार्यक्रम आयोजित करती है तथा जनजातीय कला के विभिन्न पक्षों पर केंद्रित विविध लेखन सामग्रियों तथा लेखों का प्रकाशन करवाती है। ये भी वर्तमान में गौरव की आस में हैं। इसी तरह राज्य के साहित्यकारों तथा साहित्य के संरक्षण, प्रोत्साहन तथा विकास के उद्देश्यों की प्रतिपूर्ति के लिए मध्य प्रदेश शासन ने साहित्य अकादमी के रूप में मध्य प्रदेश साहित्य परिषद का गठन किया गया है। इसकी प्रथम स्थापना तत्कालीन मध्य प्रदेश की राजधानी नागपुर में सन 1954 में की गयी थी। वर्ष 1956 में नये मध्य प्रदेश राज्य के गठन के बाद इस परिषद को राजधानी भोपाल में स्थानांतरित कर दिया गया। आज कुछ अपवाद छोड़ दिया जाय तो ये भी सियासत दानों के हाथों की कठपुतली से ज्यादा कुछ नहीं हैं। मराठी साहित्य अकादमीमध्यप्रदेश के गठन से ही प्रदेश के निर्माण में मराठी भाषियों का अपना एक स्थान एवं महत्व रहा है। मध्य भारत से मध्यप्रदेश के निर्माण के समय नागपुर तथा अन्य स्थानों से मध्यप्रदेश में आये में मराठीभाषी लोगों की संख्या बहुतायत में है। मराठीभाषी भोपाल, इन्दौर, उज्जैन, देवास, रतलाम, धार मन्दसौर, हरदा, खण्डवा, बुरहानपुर, होशंगाबाद, इटारसी, जबलपुर, ग्वालियर, सागर, बैतूल, मुलताई आदि जिलों में बहुतायत से निवास करते हैं। मराठी संस्कृति एवं साहित्य को अक्षुण रखने तथा उन्हें बढ़ावा देने एवं उनका संवर्द्धन करने के उद्देश्य से साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद् के अन्तर्गत मराठी प्रभाग वर्ष 2008 से कार्यरत था। वर्ष 2010 से इसका विस्तार करने हेतु मराठी साहित्य अकादमी का गठन शासन द्वारा किया गया।अकादमी द्वारा मराठी प्रभाग के गठन से ही मराठी साहित्य संस्कृति को बढ़ावा देने उनका संवर्द्धन करने तथा परम्परा को अक्षुण रखने के उद्देश्य से विभिन्न आयोजन किये जा रह है, जिससे प्रदेश में निवासरत मराठी भाषियों को स्थाई मंच प्राप्त हो सके साथ ही प्रदेश से बाहर की पारंपरिक कलाओं से भी प्रदेश के मराठीभाषी एवं अन्य लोगों को अवगत कराया जा सके। मगर ये भी अपने उद्देश्य की जंग लड़ रही हैं।
विचारधारओं के द्वंद्व ने लोक कला और साहित्य को सगा और सौतेला बना डाला...एक विशेष विचारधारा की सरकार होने पर दूसरी विचारधारा के लोगों को किनारे कर दिया जाता है...लंबे समय से सियासी पैमाने पर साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को जाँचा और परखा जाता है जबकि अन्य राज्यों में स्थिति इससे उलट है । यदि आप योग्य हैं अनुभवी हैं तो आपके साहित्यिक अवदान से आपको वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
भारत भवन जो दुनिया भर में एक बड़े कला घर की ख्याति अपने में समेटे हुआ है वहां पर केवल राजनैतिक नियुक्तियां होना कलाकारों का उससे दूर करता है। भारत भवन ट्रस्ट में घपले और घोटाले की गन्ध यह स्पष्ट करती है की यहाँ भी कला का दम घुट रहा है।
अब थोड़ी सी बात अपनी जमात की भी कर ले मीडिया....जिस उर्वरा भूमि से निकल कर माखनलाल चतुर्वेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी, राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी जैसे देदीप्यमान नक्षत्रों ने पत्रकारिता की पताका को देश दुनिया में फहराया, उस राज्य में सच्ची पत्रकारिता और उच्चकोटि का लेखन अब इतिहास बन गया हैं।पार्टी के कार्यकर्ताओं की तरह पत्रकारों का प्रदर्शन होता है, वो राज्य के वजीरों के दूत नजर आते हैं। लोकतंत्र की सबसे सशक्त कड़ी मीडिया का यूँ सत्ता के आगे झुकना और टूटना भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। आज राज्य में घट रहे घटनाक्रम किसी वैचारिक पैमाने पर तोलमोल कर ही परोसे जा रहे हैं यानी जिस प्रेस को समाज की पहरेदारी करना है, वह मात्र संदेश वाहक बन गया है.....।