भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में संगठन महामंत्री की अहम भूमिका होती है, केंद्रीय भाजपा संगठन हो या प्रदेश का भाजपा संघठन, यह संघ तय करता है कि भाजपा का संघठन कैसे और कौन चलेगा.....
लंबे समय बाद 2003 में मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार में वापसी हुई थी, उस समय प्रदेश में संघठन महामंत्री कप्तान सिंह सोलंकी थे, कार्यकर्ताओं की नब्ज समझने वाले और उनकी क्षमता कि भरपूर उपयोग करने वाले कप्तान सिंह सोलंकी को संघठन पर गजब की पकड़ के साथ तेजतर्राट संघठन महामंत्री होने का तगमा उनके लिए मिला था,
हताश और निराश भाजपा कार्यकर्ताओं में जोश भर कर उमा भारती जैसे नेताओं को नियंत्रण करते हुए 2003 में प्रदेश में भाजपा की सत्ता में कैसे वापसी हो इसकी रणनीति का मुख्य श्रेय कप्तान सिंह सोलंकी को जाता है ।
सत्ता में भाजपा की वापसी हुई, कप्तान सिंह ऐसे पहले संघठन महामंत्री होंगे जिन्होंने कैबिनेट की बैठक मंत्रालय में ली.....
कप्तान सिंह के बाद माखन सिंह को संघठन का महामंत्री नियुक्त किया गया। संघठन उनके बाद लंबी उठापटक चली और
उत्तराधिकारी के रूप में उन्हीं के अधीनस्थ रहे अरविंद मेनन को संघठन महामंत्री की बागडोर सौंपी गई, अरविंद मेनन ने संघठन की कमान संभालते हुए प्रदेश में बडे नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक-एक कार्यकर्ता की दशा और दिशा तय करने में मेनन की भूमिका किसी से छिपी नहीं है राजनीति में चाणक्य की संज्ञा उन्हें दी जाने लगी थी..... विन्ध और और महाकौशल में उनके द्वारा खड़े किये गये संघठन के कारण आज सत्ता मुकाम पर है ।
वर्ष 2016 में अरविंद मेनन के स्थान पर सुहास भगत को मध्य प्रदेश का संघठन महामंत्री के रूप में भाजपा संघठन में कार्य करने के लिए भेजा गया......
एक तरफ जहां अरविंद मेनन कार्यकर्ताओं से निरंतर संवाद और संपर्क रखते थे वहीं दूसरी तरफ सुहास भगत एक कोठी में मोनी बाबा की तरह कैद होकर कुछ तयशुदा लोगों से ही मिलते थे, भगत भाजपा के अहम किरदार थे और 2018 में प्रदेश से भाजपा की सत्ता चली गई, कार्यकर्ताओं से दूर रहना और जमीनी हकीकत को नहीं समझना पाना भगत की बड़ी नाकामी साबित हुई । इस हार की कभी समीक्षा नहीं हुई, जो लोग इस पराजय के लिए जिम्मेदार थे, उन पर अनुशासन का कभी डंडा नहीं चला बल्कि वह संघठन में और मजबूत होते चले गए यहीं से संघठन का अनुशासन जीर्ण शीर्ण अवस्था में पड़ा रहा इस चुनाव में अनुशासन समिति ने क्या निर्णय लिए आज भी वह सरकारी दफ्तरों की फाइलों की तरह कैद है ।
लंबे समय से जिलों में कार्य कर रहें संघ से भेजें गये जिला संघठन मंत्रियों को वापिस बुलाने का निर्णय भी गलत बताया गया और जिलों से वापिस बुलाये गये संघठन मंत्रियों का भविष्य भी खराब करने के गंभीर आरोप भगत पर लगे.....
सरकार कांग्रेस की बनी कमलनाथ दिग्विजय एक हुए और सिंधिया अलग-थलग पडे, कांग्रेस के कुछ मंदबुद्धि वाले नेताओं ने जब सिंधिया की राजनीति में खत्मा लगाने की कोशिश की तब कमलनाथ दिग्विजय सिंह और सिंधिया में आर पार की लड़ाई शुरू हुई,दिल्ली के सूत्र बताते है कि कांग्रेस के ही कुछ नेताओं की रणनीति के कारण ही सिंधिया का सरकारी बंगला खाली कराया गया था यहीं से सिंधिया ने अपनी राजनीति की दिशा बदलने का निर्णय लिया ।
सिंधिया ने भाजपा की सदस्यता ली प्रदेश में भाजपा ने सरकार बनाई और इसका श्रेय लेने में सुहास भगत जुट गए जबकि भाजपा के अधिकतर नेता और विधायक दबी जुबान में सुहास भगत की निष्क्रियता कहे या ढुलमुल रवैया पर समय समय पर सवाल खड़े करते रहें.....
भाजपा संघठन में संघठन महामंत्री का कार्यकाल निश्चित होता है लेकिन अधिकतर उदाहरणों में संघठन महामंत्री को अपने सफलतम कार्य क्षमता के कारण भाजपा उन्हें उत्कृष्ट स्थान पर भेजती है, यहां संघ ने सुहास भगत को बौद्धिक प्रकोष्ठ में भेज कर यह जता दिया है कि उनकी बौद्धिक क्षमता कितनी है ।
-पवन देवलिया