स्थानापत्र मातृत्व या 'सरोगेसी' एक ऐसा कार्य है, जिसमें नारी अपनी गर्भावस्था किसी और अनुर्वर दम्पति के लिए लेती है। वर्तमान युग में इस प्रतिक्रिया के प्रयोग ने भाव रूप से काफी प्रसिद्धि पाई है।
क्या हो रहा है हमारे देश में…
भारतीय समाज सरोगेसी को अस्वीकार करता है, क्योंकि इसमें किसी और का बच्चा किसी और की गर्भ में पलता है।
भारतीय समाज के अनुसार स्त्री तथा पुरुष तभी संभोग कर सकते हैं जब वे पति-पत्नी हो। पति के अलावा महिलाएं किसी अन्य व्यक्ति का वीर्य नहीं ले सकती तथा किसी और से गर्भवती नहीं हो सकती। भारतीय समाज के अनुसार यदि किसी दंपति को संतान की प्राप्ति नहीं हो रही हो तो उन्हें बच्चा गोद ले लेना चाहिए।
संभावित सरोगेट माताओं की अंतरराष्ट्रीय मांग और चिकित्सा की सुलभ उपलब्धियों ने ही इस क्षेत्र को स्वीकार्य और प्रसिद्ध बनाया है। सरोगेसी प्रक्रिया मीडिया में भी काफी हिट प्राप्त किया है। अनगिनत एजेंसियां तथा क्लीनिकों ने इस प्रक्रिया को प्रजनन करने के लिए खोला है। इस प्रकार स्थानापन्न मातृत्व काफी लोकप्रिय हो गया है।
क्या हो रहा है दुनियाभर में..
सरोगेट मातृत्व का अभ्यास एक लंबा इतिहास रहा है और इसे कई संस्कृतियों में स्वीकार किया गया है। ‘ओल्ड टेस्टामेन्ट्स' नाम की पुस्तक में इब्राहिम, सारा और हागर के बीच की कहानी तथा रेछल और नौकर की कहानी, यह स्थापित करती है कि स्थानापन्न मातृत्व यहूदी समाज में स्वीकृत था।
हालांकि यूरोपीय संस्कृतियों में सरोगेसी निःसंदेह अभ्यास किया गया है, परंतु अतीत में इसे सामाजिक और कानूनी नियमों के तहत औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया था। परम्परागत समाजों में सरोगेट मां, अपने बच्चे को 'दान' के रूप में देती है, परंतु पाश्चातिक समाजों में सरोगेट मां अपने बच्चे को 'दूर' कर देती है।
कई समाजों में सरोगेसी, दोस्ती और सज्जनता के रूप में भी देखने को मिलता है। ऑस्ट्रेलिया में सरोगेसी प्रक्रिया, पिछले शताब्दी तक अनौपचारिक रूप से उपस्थित थी।
ऑस्ट्रेलिया के पहले सरोगेसी का मामला 1988 में हुआ था। इस प्रक्रिया द्वारा पैदा होने वाली पहली ईवीएफ बच्ची एलिस किर्कमान, मेल्बोर्न में 23 मई 1988 को हुआ था। हाल ही में एक महिला ने अपनी भाई तथा भाभी के आनुवंशिक भ्रूण को अपने गर्भ पात्र में उपजने दिया।