मध्य प्रदेश सरकार ने राजधानी परियोजना प्रशासन सीपीए को बंद कर दिया है|  सीपीए के बंद होने के साथ  सीपीए के  नगर निगम को लिखे एक पत्र ने आंखें खोलने वाले खुलासे किए हैं| जब तक सीपीए अस्तित्व में रहा तब तक वह अमले की कमी के चलते सरकारी भूमि पर हुए कब्जे को नहीं हटा पाया|  सीपीए के ये घड़ियाली आंसू चर्चा में हैं, क्या ध्रतराष्ट्र बने नगर निगम और जिला प्रशासन की  आपराधिक लापरवाही आगे भी जरी रहेगी? 

दरअसल सीपीए के पत्र से खुलासा हुआ है कि राजधानी की सैंकड़ों एकड़ बेशकीमती जमीन पर कब्जे हो चुके हैं|

यह कब्जे एक-दो साल में नहीं हुए बल्कि लगातार होते रहे और सीपीए आंख बंद करके बैठा रहा|  सीपीए ने बीच-बीच में नगर निगम को पत्र लिखे और इन अतिक्रमण को हटाने की मांग की लेकिन नगर निगम उसकी कहां सुनता| 

सीपीए बंद हो गया लेकिन अब उसके क्षेत्राधिकार में आने वाली जमीन को कब्जे से कौन मुक्त कराएगा|  क्या सरकार इतने बड़े पैमाने पर जीपीएस की जमीन पर हुए अतिक्रमण को हटाने का साहस कर पाएगी|

चौंकाने वाली बात यह है कि सीपीए ने इससे पहले भी नगर निगम और जिला प्रशासन को इन अतिक्रमण की शिकायत की थी|

हालांकि सीपीए खुद भी यह अतिक्रमण हटाने में इंटरेस्टेड नहीं था, शायद इसी वजह से वह अतिक्रमण हटाने के लिए पत्र लिखने जैसी साधारण खाना पूर्ति करता रहा|

यह बात सही है कि सीपीए के पास अतिक्रमण हटाने के लिए फोर्स नहीं थी| लेकिन यदि नगर निगम और जिला प्रशासन नहीं सुन रहा था, तो क्या सीपीए को अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए सरकार और कोर्ट तक नहीं जाना चाहिए था|

क्या इतने बड़े स्तर पर हो रहे अतिक्रमण की जानकारी उसने शासन के जिम्मेदारों तक नहीं पहुंचाई थी| 

यदि शासन में बैठे जिम्मेदार लोग सीपीए के इन पत्रों से अनजान थे तो ऐसे शासन तंत्र को क्या कहा जायेगा| 

राज्य सरकार ने राजधानी परियोजना वनमंडल (सीपीए) को बंद कर दिया है. इस पर कैबिनेट की मुहर लग चुकी है| इससे पहले राजधानी परियोजना वनमण्डल ने कलेक्टर, नगर निगम कमिश्नर और एसडीएम भोपाल को पत्र लिखकर दबंगों के चंगुल से बेशकीमती शासकीय जमीन को अतिक्रमण से मुक्त कराने का आग्रह किया है. यही नहीं, राजस्व वन भूमि पर बर्खास्तशुदा सत्कार अधिकारी ने तो विकास कुंज नाम से कॉलोनी काट दी और नगर निगम और जिला प्रशासन मूक बधिर बना रहा. अतिक्रमण को हटाने के लिए सीपीए बार-बार पत्र लिखता रहा लेकिन उस पर कोई कार्यवाही आज दिनांक तक नहीं हो पाई. राजधानी परियोजना वन मंडल वन संरक्षक कहते हैं कि हमारे पास फोर्स नहीं है कि हम स्वयं जाकर अतिक्रमण को हटाए. केवल जिला प्रशासन और नगर निगम को पत्र ही लिख सकते हैं.

सीपीए वन मंडल ने पिछले दिनों फिर एक पत्र नगर निगम कमिश्नर को लिखा. इस पत्र में अतिक्रमणकारियों के नाम उनके कब्जे की जमीन का पूरा ब्यौरा भी भेजा . 

सीपीए के इस पत्र के अनुसार 692 अतिक्रमणकारियों ने शहर के बीच बेशकीमती जमीनों पर कब्जा कर दुकानें और आलीशान बंगले बनवा लिए हैं. सबसे अधिक अतिक्रमण अयोध्या बाईपास पर हुए हैं. जिला प्रशासन के नीचे अयोध्या बायपास में की भूमि पर अहिंसा बिहार के नाम से कॉलोनी भी बन गई है. ग्रीन बेल्ट जमीन को नष्ट कर कॉलोनी वासियों ने कार पार्किंग की जगह भी बना ली है. आक्रमण की जमीन पर और पाइप दुकान में बड़ी संख्या में खुल गई है. वेलकम अपार्टमेंट, जिंदल हॉस्पिटल, गिरनार विला, तिरुपति अपार्टमेंट, लक्ष्मी बिहार के अलावा व्यक्तिगत लोगों ने भी कब्जा कर रखा है.

वन भूमि के कब्जे से पाई गई भूमि
 राजधानी परियोजना वन मंडल ने कलेक्टर को पत्र लिखकर बाबा नगर झुग्गी बस्ती, विकास कुंज के मकान, फॉर्च्यून प्राइड के कुछ मकान, शगुफ्ता कुरेशी के कब्जे वाली वन भूमि और त्रिलोचन नगर आदि के आधिपत्य में 37.100 हेक्टेयर जमीन राजस्व विवाद में फंसी हुई है. पत्र में सीमांकन कराने की मांग की गई है. साथ ही वन भूमि को कब्जे से छुड़ाने का भी आग्रह किया गया है. सरकार में रसूखदार रहे बर्खास्तशुदा सहायक सत्कार अधिकारी तिग्गा ने विकास कुंज के नाम से पूरी कॉलोनी ही बसा दी है. तिग्गा के रसूख के चलते अब तक किसी ने भी कार्यवाही नहीं की है.

 किसके कब्जे में कितनी जमीन

 बाबा नगर झुग्गी बस्ती -1.311 हेक्टेयर
 विकास कुंज कॉलोनी -0.375
 फॉर्च्यून प्राइड के कुल मकान- 0.135
 शगुफ्ता कुरैशी के आधिपत्य में- 0.093
 त्रिलोचन नगर - 0.119