भोपाल: राज्य सरकार ने केंद्र सरकार द्वारा पारित जल प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण संशोधन अधिनियम 2024 को मध्यप्रदेश राज्य में अंगीकृत कर लागू कर दिया है। इसके लिये मप्र के पर्यावरण राज्य मंत्री दिलीप अहिरवार ने 24 फरवरी 2026 को मप्र विधानसभा में शासकीय संकल्प प्रस्तुत किया था जिसे सर्वसम्मति से पारित किया गया था। अब राज्य के पर्यावरण विभाग ने इसे मप्र राज्य में अंगीकृत करने की अधिसूचना जारी कर दी है जिससे यह पूरे प्रदेश में प्रभावशील हो गया है।

ये हैं नये प्रावधान :

संशोधन अधिनियम में कई उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से हटाकर दंड का प्रावधान किया गया है। अधिनियम के अनुसार, किसी भी उद्योग या उपचार संयंत्र की स्थापना के लिए एसपीसीबी-स्टेट पाल्युशन कंट्रोल बोर्ड की पूर्व सहमति आवश्यक है, जिससे जल निकाय, सीवर या भूमि में सीवेज का निर्वहन होने की संभावना हो। अधिनियम में यह निर्दिष्ट किया गया है कि केंद्र सरकार, सीपीसीबी-सेंट्रल पाल्युशन कंट्रोल बोर्ड के परामर्श से, कुछ श्रेणियों के औद्योगिक संयंत्रों को ऐसी सहमति प्राप्त करने से छूट दे सकती है। 

अधिनियम में यह भी कहा गया है कि केंद्र सरकार एसपीसीबी द्वारा दी गई सहमति को प्रदान करने, अस्वीकार करने या रद्द करने के लिए दिशानिर्देश जारी कर सकती है। अधिनियम के तहत, किसी उद्योग या उपचार संयंत्र की स्थापना की अनुमति निर्धारित करने में उपयोग किए जाने वाले निगरानी उपकरणों से छेड़छाड़ करने पर जुर्माना लगाया जाएगा। जुर्माना 10,000 रुपये से 15 लाख रुपये तक होगा। 

अधिनियम के तहत, एसपीसीबी जल निकायों में हानिकारक या प्रदूषणकारी पदार्थों के निर्वहन का कारण बनने वाली किसी भी गतिविधि को तत्काल रोकने के लिए निर्देश जारी कर सकता है। अधिनियम कुछ अपवादों को छोडक़र, जल निकायों या भूमि पर प्रदूषणकारी पदार्थों के संबंध में एसपीसीबी द्वारा निर्धारित मानकों के उल्लंघन को भी प्रतिबंधित करता है। अपवादों में भूमि सुधार के लिए नदी के किनारे गैर-प्रदूषणकारी पदार्थों का निक्षेपण शामिल है। इन प्रावधानों का उल्लंघन डेढ़ वर्ष से छह वर्ष तक के कारावास और जुर्माने से दंडनीय है। 

अधिनियम में इस दंड को हटाकर इसके स्थान पर 10,000 रुपये से 15 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया गया है। अधिनियम के किसी भी प्रावधान के उल्लंघन के लिए जुर्माना न भरने पर तीन वर्ष तक का कारावास या जुर्माने की राशि के दोगुने तक का जुर्माना हो सकता है। अधिनियम के अनुसार केंद्र सरकार, अधिनियम के अंतर्गत दंड निर्धारण हेतु निर्णायक अधिकारियों की नियुक्ति कर सकती है। अधिकारी का स्तर केंद्र सरकार के संयुक्त सचिव या राज्य सरकार के सचिव के स्तर का होना चाहिए। 

निर्णायक अधिकारी द्वारा पारित आदेशों के विरुद्ध राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण में अपील की जा सकती है, जिसके लिए लगाए गए दंड का 10 प्रतिशत जमा करना होगा। निर्णायक अधिकारी द्वारा लगाए गए दंड की राशि पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत स्थापित पर्यावरण संरक्षण कोष में जमा की जाएगी। अधिनियम में यह निर्दिष्ट है कि यदि सरकारी विभागों द्वारा अधिनियम के किसी भी प्रावधान का उल्लंघन करता है, तो विभाग प्रमुख को अपने मूल वेतन के एक महीने के बराबर जुर्माना अदा करना होगा।