भोपाल: मप्र में वर्ष 2000 में पृथक छत्तीसगढ़ बनने के पहले शासकीय सेवा में नियुक्त हुये कर्मियों को रिटायरमेंट के बाद डीए एवं अन्य सुविधाओं को देने के लिये छत्तीसगढ़ राज्य से मंजूरी लेना पड़ती है जिससे यहां के कर्मियों को भुगतान में अत्यधिक विलम्ब हो जाता है। इसका मूल कारण है केंद्र सरकार द्वारा बनाये मप्र-छग पुनर्गठन अधिनियम 2000 में धारा 49(6) का प्रावधान 22 साल बाद भी नहीं हटाना है।

इस मामले में भाजपा विधायक यशपाल सिंह सिसोदिया ने 22 दिसम्बर 2021 को विधानसभा में अशासकीय संकल्प भी दिया था जो पारित हो गया था। परन्तु इस संकल्प का पालन करने से राज्य के वित्त विभाग ने इंकार कर दिया है। उसने कहा है कि पुनर्गठन अधिनियम केंद्र सरकार ने बनाया है तथा वही इसमें संशोधन कर सकता है तथा पेंश संबंधी दायित्वों का निर्वहन मप्र एवं छग दोनों को करना होता है जोकि मप्र के हित में है क्योंकि इससे उस पर व्यय भार नहीं पड़ता है।

इधर भाजपा विधायक यशपाल सिंह सिसौदिया का कहना है कि पुनर्गठन अधिनियम की धारा 49(6) के तहत मप्र को पहले छग की सहमति लेना पड़ती है जबकि उप्र से अलग हुये उत्तराखण्ड एवं बिहार से अलग हुये झारखण्ड में धारा 49(6) समाप्त की जा चुकी है।

मप्र राज्य पेंशनर्स वेलफेयर एसोसियेशन भोपाल के अध्यक्ष आरके श्रीवास्तव ने भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर कहा है कि पुनर्गठन अधिनियम की धारा 49(6) की आड़ में प्रदेश के पेंशनर्स को मंहगाई राहतदिये जाने में विलम्ब करने की परिपाटी बंद की जाना चाहिये।

उल्लेखनीय है कि राज्य के सेवारत शासकीय कर्मियों को 1 मार्च 2022 से 11 प्रतिशत अतिरिक्त डीए का भुगतान हो चुका है तथा उनका डीए 20 प्रतिशत से बढक़र 31 प्रतिशत हो गया है जबकि पेंशनरों को इस बढ़े हुये डीए का लाभ इसलिये नहीं मिल पाया है क्योंकि छग सरकार से अब तक सहमति नहीं मिली है।