भारत के राजनेता गाहे- बगाहे विश्व गुरु बनने के सपने देश को दिखाते हैं,हकीकत में वे अपने पड़ोसी देशों से भो कई मामलों में पीछे हैं | कुछ मापदंडों में तो भारत की वैश्विक परिदृश्य तो यह तुलना अत्यंत निराशाजनक है | विश्व में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद  12,200 डॉलर प्रति वर्ष है। भारत के रुपए में  हिसाब लगाये तो करीब 9.6 लाख रुपए प्रतिवर्ष या करीब 80,000 रुपए प्रति माह होता है ।  अब भारत की तुलना के जो आंकड़े सामने आये हैं उसके अनुसार 2013  में बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी 981  अमेरिकी डॉलर थी जबकि भारत में प्रति व्यक्ति जीडीपी 1449  डॉलर अर्थात तुलनात्मक रुप से बहुत नजदीक |वैसे भारत की यह बढ़त हमेशा से रही और भारत हमेशा बांग्लादेश से आगे रहा। दरअसल जब 1971  में पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश का जन्म हुआ तो कई लोगों को लगता था कि यह देश बहुत दिन तक चल नहीं पाएगा, यानी आर्थिक तौर पर इसके पास इतने संसाधन या उपाय नहीं होंगे कि यह अपने आप को अस्तित्व में रख पाए। अमेरिका के मशहूर विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर तो बांग्लादेश को “बास्केट केस” ही कहते थे।इसके विपरीत बंगलादेश की प्रगति भारत की तुलना में तेज है |

2014 के बाद से बांग्लादेश ने कई मामलों में भारत से प्रतिस्पर्धा की और आगे निकल गया। 2016  में भारत और बांग्लादेश के आंकड़े लगभग बराबर थे। लेकिन इसके बाद बांग्लादेश आगे निकल गया। 2021  आते-आते विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी 2503  डॉलर और भारत की 2277  डॉलर हो गई। आज बांग्लादेश औसत प्रति व्यक्ति हर साल करीब 2 लाख रुपए कमाता है जबकि भारत में यह 1.8 लाख प्रति व्यक्ति है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का कहना है कि आने वाले समय में बांग्लादेश भारत से और भी आगे निकल सकता है।हमें बांग्लादेश की उपलब्धियों की तारीफ करनी चाहिए। एक ऐसा देश जिसे बास्केट केस कहा जाता था वह वैश्विक स्तर पर मजबूत हो रहा है, यह कोई आसान काम नहीं था और न है ।

आज हम भारतीयों को अपने आप से पूछना होगा कि आखिर हम कहां चूक गए?और यह विश्लेषण आसान नहीं है। भारत इस बात को समझने तैयार ही नहीं है कि आर्थिक मोर्चे पर उसकी हालत इतनी खराब क्यों है? यदि कोई मीडिया में जो कुछ दिखाया-लिखा जा रहा है उस पर ध्यान दे तो वह सब कुछ आंकड़ों से मेल नहीं खाएगा।सरकार तो कहती है  कि भारत बहुत तेजी से बढ़ती एक बड़ी अर्थव्यवस्था है और बात यहीं खत्म करने की कोशिश होती है । मतलब साफ है। अगर हम यह ही नहीं मानेंगे कि बांग्लादेश  हमसे आगे निकल गया है तो फिर कोई समस्या है ही नहीं।

अभी कुछ समय पहले सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स ने घरेलू बिक्री के कुछ आंकड़े  जारी किए जिसमें मार्च 2020 तक तक के पिछले पांच साल की बिक्री का लेखाजोखा था। सोसायटी का नतीजा था कि इस क्षेत्र में निरंतर और गहरी मंदी नजर आ रही है और ऐसा क्यों हो रहा है इसके लिए और गहन रिसर्च यानी शोध की जरूरत है। सवाल है कि रिसर्च कौन करे? इशारा सरकार की ही तरफ था या फिर सीधे नीति आयोग की तरफ। ऑटोमोबाइल सेक्टर देश के कुल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आधे का योगदान करता है। 2014  में भारत की जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की हिस्सेदारी1 प्रतिशत थी और ऑटोमोबाइल सेक्टर का योगदान करीब 8 प्रतिशत था।

ऑटोमोबाइल की बिक्री में धीमी रफ्तार के चलते इस सेक्टर की जीडीपी 2021  में फिसलकर 13 प्रतिशत पर पहुंच गई है और आज शायद इससे भी कम है । यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ऐसा क्षेत्र है जहां विकसित देशो में सर्वाधिक नौकरियां होती हैं। भारत में अगर लोगों के पास अच्छी नौकरियां नहीं हैं तो इन आंकड़ों से अर्थ निकाला जा सकता है कि भारत अपने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में सुधार या मजबूती से चूक गया है। इतना ही नहीं, यह सेक्टर जिस मुकाम पर था, वहां से गिरकर नीचे आ चुका है।

हम खुद को विश्वगुरु कहने लगे हैं और इसमें कोई संदेह भी नहीं कि भारत के पास कई ऐसी चीजें हैं जो वह दुनिया को सिखाता है और उसी तरह बहुत सी बातें हम दुनिया से सीखते हैं। लेकिन उत्पादन में मामले में हम दुनिया के मुकाबले पांचवां हिस्से के ही उत्पादन करते हैं। यहाँ सवाल खड़ा होता है, ऐसा क्यों ? सरकार और देश को सोचन समझना होगा, भारत पीछे क्यों है ?