बाघों ने कठौतियों के गांव वालों के जीवन में खुशहाली ला दी है। इनका जीवन पहले की तुलना में बदल रहा है। यहां विकसित हो रहे टूरिज्म से आवक बढ़ी है। ये कहते हैं कि उन्हें बाघ के कारण ही अच्छी हवा मिल रही है। गर्मी में पानी की किल्लत नहीं होती है। जंगल सुरक्षित है। अंतर्राष्ट्रीय वन्य प्राणी संस्था डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की सर्वे रिपोर्ट में ग्रामीणों ने यह बात कही है। यह सर्वे इसी महीने किया है, जिसमें 35 से अधिक विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया था। इन विशेषज्ञों ने कठौतिया गांव में रहने वाले 40 परिवार के सदस्यों से एक-एक कर बात की है। इसके बाद रिपोर्ट तैयार की है।
.png)
सर्वे का लक्ष्य बाघों की बसाहट के आसपास रहने वाले ग्रामीणों से उनके अनुभव जानना था। साथ ही यह भी पता करना था कि बाघों की मौजूदगी ने उनके जीवन में किस तरह के बदलाव लाए हैं, उन्हें किस तरह सहूलियतें हो रही है और किन-किन मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। यह संस्था कई देशों में काम करती है, जो मप्र में भी राज्य सरकार के साथ मिलकर वन्य प्राणी संरक्षण पर काम कर रही है। यह गांव भोपाल से सटा हुआ है, जो सीहोर सामान्य वन मंडल की वीरपुर वन रेंज में आता है। जिसकी सीमा भोपाल सामान्य वन मंडल व रातापानी वन्यजीव अभयारण्य से लगी हुई है। इस क्षेत्र में 12 से अधिक बाघों के मूवमेंट का अनुमान है। सर्वे रिपोर्ट में रामा पोडे ने कहा कि बाघों का आमना-सामना हमारे लिए आम बात है।
.png)
वह कभी हमारे उपर हमला नहीं करते हैं। कस्तूरी बाई का कहना है कि वह आज भी जंगल से ही लकड़ी चुनकर लाती हैं, जब भी जंगल जाती है तो बाघों की आहट महसूस करती हैं लेकिन उन्हें बाघों ने कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है। इस गांव के प्रकाश जाटव बताते हैं कि उन्हें बाघों के बीच रहने में अच्छा लगता है। वह महसूस करते हैं कि बाघों की वजह से ही जंगल सुरक्षित है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की राज्य संचालक संगीता सक्सेना बताती हैं कि वन घनत्व वाले प्रत्येक राज्यों में बाघों की आबादी बढ़ी है। कहीं न कहीं, लोगों को ये आसानी से नजर आने लगे हैं। कुछ इलाके तो ऐसे हैं जहां बाघ, इंसानों के काफी नजदीक रहते हैं। यह सर्वे बाघों के मौजूदगी के बीच रहने वाले लोगों के व्यवहार और उनकी सोच को जानने के लिए किया गया है। जिसका विश्लेषण कर रहे हैं।