सभी दल, सदल-बल अपनी -अपनी सरकार बनने के सुनहरे ख़्वाब दिखा रहे हैं। गले तक दलदल में डूबे हुए स्वयं की वस्तुस्थिति से सभी परिचित हैं लेकिन एक दूसरे के पिछड़े किन्तु तगड़े-तगड़े प्रतिनिधियों को लुभा रहे हैं। "आजा मेरी गाड़ी में बैठ जा। "पाँच साल तक सत्ता सुख भोगकर मलाई के साथ-साथ छप्पन भोग का आनंद उठाने वाले भी अब सरकार की रीति-नीति में खोट निकाल रहे हैं। राजनीतिक रणनीतिकार

पाँच साल तक सरकार का अंग रह चुके इन भगोड़ों को आम जनता में नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली के हज़ करने जाने की घटना से सामंजस्य बता रहे हैं।

बाबाजी इसे ट्विंटी-ट्विंटी की तर्ज पर एट्टी-ट्विंटी के फॉर्मेट पर मैच होने की बात कह रहे हैं। उन्होंने तो इसे राष्ट्रवाद और विकास से जोड़कर बताया। लेकिन चोर की दाढ़ी में तिनके की तरह विभिन्न दल अपने-अपने नज़रिये से इसका मतलब भी सभी अपने -अपने ढंग से निकाल रहे हैं। वे अपनी दाढ़ी बार बार खुजलाकर तिनके ढूँढ़ रहे हैं। आसन्न तूफान को देखकर जिस तरह चूहे जहाज को छोड़कर पहले भाग जाते हैं, इसी तरह कुछ नेता दल-बदल कर रहे हैं। कुछ टिकट की जुगाड़ में ही इधर से उधर छलाँग लगा रहे हैं। विगत दिवस एक नेताजी से मुलाकात हुई, तो मैंने कहा - आप चुनाव लड़ रहे हैं ? बोले ज़रूर, बसपा से। यदि बसपा से टिकट कटेगा तो भाजपा से लड़ेंगे। भाजपा से कटेगा तो सपा से लड़ेंगे। लेकिन हमने ठान लिया है कि कुछ भी हो, हम देशसेवा करके ही रहेंगे। ऐसे देश सेवक सत्ता सुंदरी को ही अपना परम आराध्य मानते हैं। इसकी सेवा ही उनकी दृष्टि में सर्वोत्तम देशसेवा है।

  कुछ राजनीतिक जानकार सरकार में रहकर पाँच साल तक मलाई खाने के बाद अब पाला बदलने का कारण उनका हाजमा बिगड़ने का परिणाम बता रहे हैं । वहीं कुछ दोबारा दाल नहीं गलने की आशंका के चलते पानी बदलने अथवा सोडा-पानी के प्रबंधन की युक्ति बता रहे हैं। जबकि इस पलायन को सत्तारूढ़ दल उनकी परफॉर्मेंस में कमी की वजह से एक्स्ट्रा प्लेयर की भूमिका में बैठाने का भय बता रहा है। लेकिन, राजनीति के खेल के धुरंधर खिलाड़ी रह चुके, कमेंटेटर एक ही बात कह रहे हैं - "आजकल के नेता लोग किसके, खाया-पिया खिसके !! उनके खिसकने तक तो ठीक है, लेकिन ज़रूरत से ज़्यादा खाकर दूसरे के घर जाकर कहीं गोबर न कर दें। यह डर सत्तारूढ़ दल को भी सत्ता रहा है। गोबर एक बहुपयोगी वस्तु है, जिससे घर को लीप-पोतकर शुद्ध एवं स्वच्छ भी किया जा सकता है और पड़ोसी के गुड़ में मिलाकर, गुड़-गोबर भी। फ़िलहाल सभी की नज़र इनके इन्हीं कृत्य पर टिकी हुई हैं। जो नज़र नहीं टिक पाते उन्हें भी मीडिया मुर्ग -संघर्ष द्वारा दिन में एक -दो बार तो अवश्य ही स्मरण करा देता है। इसके लिए जितनी तारीफ की जाए, उतनी टीआरपी बढ़ने की पूरी-पूरी संभावना है।

कमल किशोर दुबे