भोपाल. प्रदेश के आदिवासियों को 15 नवंबर 2021 का दिन हमेशा याद रखना चाहिए. इस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आदिवासियों के लिए बड़ी-बड़ी घोषणाएं और सौगाते दी. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि मध्य प्रदेश के असल राजा आदिवासी रहे हैं, परंतु मध्य प्रदेश के गठन के बाद से ही आदिवासी राजनीतिक दलों के लिए वोट बैंक बनकर रह गए हैं.

राजनीतिक दल चाहे वह कांग्रेस हो या फिर बीजेपी दोनों ने आदिवासी नेताओं को राजनीतिक मोहरे और उनके वोट बैंक हासिल करने के रूप में इस्तेमाल किया है. चुनावी वर्ष में राजनीतिक दल आदिवासी राग अलापने रखते हैं किंतु सत्ता हासिल करने के बाद आदिवासी नेताओं की उपेक्षाओं का दौर शुरू हो जाता है. प्रदेश में आदिवासियों की जनसंख्या 21 पर्सेंट है और 122 विधानसभा क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका में है. विधानसभा चुनाव के 4 महीने शेष रह गए हैं. एक बार फिर कांग्रेस से आदिवासी नेतृत्व की मांग उठने लगी है. पूर्व मंत्री एवं आदिवासी युवा तुर्क उमंग सिंघार का कहना है कि आदिवासी सत्ता और संगठन में अपनी हिस्सेदारी चाहता है.

मध्य प्रदेश के विभाजन से लेकर अब तक चुनाव परिणामों पर नजर डालें तो स्पष्ट हो जाता है कि प्रदेश की सत्ता की चाबी आदिवासियों के पास ही रही है. वर्ष 2018 तक आदिवासी वोट बैंक भाजपा के साथ रहा. यही कारण है. भाजपा लगातार सत्ता में बनी रही. यानि 2018 प्रदेश की आदिवासियों के लिए आरक्षित 47 सीटों में से 32 सीटों पर भाजपा और 15 सीटों पर कांग्रेस का कब्जा है. इसके अलावा प्रदेश में 75 सीटें ऐसी है जो आदिवासियों के लिए आरक्षित तो नहीं है, लेकिन उन पर आदिवासियों का वोट निर्णायक होता है.

यह सीटें हैं, श्योपुर, विजयपुर, बदनावर, बमोरी, कोलारस, केवलारी, मांधाता, कोतमा, सेमरिया, सिरमौर, त्यौथर, नागौद, सिंगरौली, चुरहट, रामपुर बघेलान, गुढ़, पन्ना, सीधी, सिवनी, खातेगांव, बरगी, सिहावल, जबेरा, सिवनी मालवा, बुधनी, विजयराघवगढ़, पाटन, पिपरिया, पन्ना, मुड़वारा,  परसवाड़ा, आमला, बैतूल, मुलताई, भोजपुर, बहोरीबंद, सिलवानी, देवरी, गोटेगांव, महू, खरगोन, कसरावद, महेश्वर, पवई, सिंगरौली, हरदा, मैहर, पनागर, अमरपाटन, मऊगंज, त्यौथर, चित्रकूट, छिंदवाड़ा, सौसर, चौरई, परासिया, चाचौड़ा, बीना सांची, बड़वाह, लांजी, कटंगी, पोहरी, जावद, पिछोर, खंडवा, बालाघाट, राघौगढ़, तेंदूखेड़ा नरसिंहपुर खुरई और शिवपुरी है.

भाजपा व कांग्रेस में नहीं मिला आदिवासी नेताओं को एक्सपोजर

जब-जब आदिवासी नेताओं ने नेतृत्व के लिए अपनी आवाज बुलंद की, तब-तब उन्हें पार्टी की मुख्यधारा से हाशिए पर धकेल दिया गया. चाहे वह सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते हो या फिर दिवंगत नेता प्रतिपक्ष जमुना देवी. पिछले एक दशक से सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिए तड़प रहे हैं किंतु दिल्ली से लेकर भोपाल तक किसी भी नेता ने उनकी बात नहीं सुनी. भाजपा ने केवल उनको अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली गई.

महाकौशल के मुखर आदिवासी नेता ओम प्रकाश धुर्वे और आदिवासी सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते का राजनीतिक पुनरुत्थान नहीं हो पाया. आदिवासी हितों की बात करने पर ओम प्रकाश धुर्वे को शिवराज सिंह मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा कर दिया गया. यही नहीं, फग्गन सिंह कुलस्ते द्वारा प्रदेश अध्यक्ष बनने की इच्छा जताने के बाद उन्हें हाशिए पर धकेलने की साजिश आज तक चल रही है. उनके स्थान पर नए आदिवासी नेताओं को प्रोजेक्ट किया जाने लगा है.

भाजपा में सबसे वरिष्ठ आदिवासी नेता एवं मंत्री विजय शाह है पर उन्हें भी प्रदेश की राजनीति में आदिवासी नेता के रूप में एक्सपोजर नहीं मिल पाया है. विंध्य की महिला आदिवासी नेता मीना सिंह हो या फिर पूर्वी निमाड़ की रंजना बघेल बीजेपी में मोहरे बनकर रह गई है. आदिवासी मतदाताओं को उम्मीद थी कि उनके नेताओं को बीजेपी में उन्हें एक्सपोजर मिलेगा. यही वजह थी कि कांग्रेस का वोट बैंक 2018 विधानसभा चुनाव के पहले बीजेपी में शिफ्ट हो गया और यही कारण रहा कि भाजपा की लगातार मध्य प्रदेश में सरकार बनी रही.

2018 के चुनाव में आदिवासी मतदाता भाजपा से निराश हुआ और वह कांग्रेस की ओर रुख कर गया. परिणाम कांग्रेस सत्ता में आ गई. यह बात अलग है कि 15 महीने के बाद कांग्रेस सत्ता से बेदखल हो गई. लेकिन इस बीच कांग्रेस ने दबंग आदिवासी नेताओं की उपेक्षा शुरू हो गई. मसलन, आदिवासी युवा तुर्क उमंग सिंघार के बढ़ते राजनीतिक के बढ़ते कद को हाशिए पर धकेलने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने जयस नेता एवं विधायक डॉ हीरालाल अलावा और युवा कांग्रेस के अध्यक्ष डॉ विक्रांत भूरिया को आदिवासी नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिशें शुरू हो गई हैं. शायद यही वजह है कि पिछले दिनों कांग्रेस कार्यालय में संपन्न आदिवासी विकास परिषद की बैठक में उमंग सिंघार ने कहा कि " जिस सियासत की विरासत हम हैं.. सियासत की विरासत भी हम करेंगे.

प्रदेश की राजनीति में हमेशा ठगे गए आदिवासी नेता

गठन के बाद से प्रदेश के आदिवासी कांग्रेस से जुड़े रहे. प्रदेश में कांग्रेस 42 सालों तक सत्ता में रही. इन 42 सालों में 20 साल ब्राह्मण, 18 साल ठाकुर और तीन साल बनिया (प्रकाश चंद्र सेठी) मुख्यमंत्री रहे. यानी 42 सालों तक कांग्रेस राज में सत्ता के शीर्ष सवर्ण रहे. केवल  आदिवासी राजा केवल नरेश चंद्र सिंह (13 मार्च 1969 से 25 मार्च 1969 तक ) 26 दिनों के लिए ही मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह पाए. इसके बाद से आज तक कोई भी आदिवासी नेता प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं बन पाया. चुनाव में जरूर आदिवासी वोट बैंक भुनाने की कोशिश होती रही. आदिवासी वोट बैंक मूलरूप से कांग्रेस के साथ रहा है. इंदिरा गांधी की निधन के बाद कांग्रेस में आदिवासी नेता राजनीतिक रूप से असुरक्षित महसूस करने लगे. इसकी वजह भी साफ थी कि मुखर आदिवासी नेताओं को कांग्रेस में हाशिए पर धकेलने की एक अंतहीन साजिश शुरू हो गई.

यह सिलसिला 80 के दशक से शुरू हुआ जो अब तक निरंतर चल रहा है.  दिवंगत मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह और उसके बाद उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी दिग्विजय सिंह भी आदिवासी नेताओं को मुख्यमंत्री की दौड़ से पीछे धकेलते रहे. यही वजह रही कि आदिवासी नौकरशाह से राजनीति में आए स्वर्गीय अजीत जोगी अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री तो नहीं बन पाए. मध्यप्रदेश के विभाजन के बाद अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री  बने. ऐसा नहीं था कि मुख्यमंत्री पद के योग्य दावेदारों में आदिवासी नेता नहीं थे. दिलीप सिंह भूरिया, झूमक लाल भेड़िया, बिसाहूलाल महंत, बसंत राव उईके, जमुना देवी (ये सभी दिवंगत हो गए है) में नेतृत्व और प्रशासनिक क्षमता भरपूर थी किंतु साजिशन उन्हें सीएम कुर्सी के नजदीक तक पहुंचने नहीं दिया गया. कांग्रेस में राजनीतिक असुरक्षा की वजह से ही आदिवासियों का कांग्रेस से मोहभंग होने लगा.

इसका परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे आदिवासी वोट बैंक बीजेपी की तरफ शिफ्ट होने लगा. इतना ही नहीं, कांग्रेस के आदिवासी नेता भी भाजपा में शामिल होने लगे. दिलीप सिंह भूरिया, अरविंद नेताम, प्रेम नारायण ठाकुर, निर्मला भूरिया और सुश्री अनसूइया उईके ने बीजेपी का दामन थाम लिया. कांग्रेसी बीजेपी में गए आदिवासी नेताओं को कोई महत्वपूर्ण मुकाम हासिल नहीं हुआ. हां, अनुसुइया उइके इसका अपवाद जरूर रहीं है. वह न केवल राज्यसभा सदस्य बनी, बल्कि भाजपा ने उन्हें राज्यपाल भी बनाया हुआ है. यह उल्लेख करना उचित होगा कि कमलनाथ सरकार गिराने साजिश में शामिल आदिवासी नेता बिसाहू लाल सिंह को जरूर विभीषण की भूमिका अदा करने पर भाजपा सरकार में उन्हें मंत्री पद मिला. इनके अलावा कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में गए आदिवासी नेताओं का कोई बड़ा राजनीतिक मुकाम हासिल नहीं हुआ.