हम भारतीय लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना ही समझते हैं । हममें से ज्यादातर लोग ऐसा ही मानते हैं लेकिन दुनिया के बाकी लोकतंत्रों में भी ऐसा ही होता होगा । लोकतंत्र का अर्थ स्वतंत्र अभिव्यक्ति यानी बोलने की आजादी, धर्म की आजादी और आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार भी के साथ नागरिकों  की प्रतिष्ठा और सम्मान भी है | लोकतंत्र का पहल पायदान नागरिक प्रतिष्ठा की स्थापना और सम्मान है | दुर्भाग्य से भारत के नागरिक से सम्मानजनक व्यवहार सिर्फ चुनाव में वोट मांगने क ही होता है | इसके बाद राजनीतिक संप्रभुओ और प्रशासनिक कारकूनों का दुर्व्यवहार रोज देखने को मिलता है |

हम वैश्विक संकेतकों पर  पिछड़ेपन से अवगत हैं और ये संकेतक सही भी हैं । भारत एक आंशिक लोकतंत्र ही है। जिसके चलते देश अपनी पूरी क्षमता और ताकत का इस्तेमाल नहीं कर पा रहा हैं। इसी कारण से हमें भारत में मानवाधिकारों और अल्पसंख्यकों के साथ बरताव में  सुधार से पहले “नागरिक प्रतिष्ठा की स्थापना सम्मान” पर विचार करना चाहिए |

हाल ही घटी [नुपुर शर्मा निष्कासन ]घटना और उसकी विदेश से आई प्रतिक्रिया ने भारत की संप्रभुता पर ही सवालिया निशान लगा दिता |संप्रभु राष्ट्र वे होते हैं जिनके पास अपनी पूर्ण शक्ति और अधिकार होता है। उन्हें कोई भी ऐसा काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता जिसे वे न करना चाहें और  अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक महान शक्ति उसे माना जाता है जिसका प्रभाव उसकी सीमाओं से बाहर भी दूर तक होता है। ऐसी शक्ति न सिर्फ बाहरी प्रभाव का विरोध कर सकती है बल्कि वह अन्य राष्ट्रों या देशों पर अपनी इच्छा थोप भी सकती है। इसी को विश्वगुरु बनने की अगला कदम कहकर प्रचार भी हो रहा है |

आज अमेरिका ऐसी एक शक्ति है जिसका प्रभाव दुनिया भर में है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसने सैन्य शक्ति से लेकर आर्थिक मोर्चे तक और दुनिया की रिजर्व करेंसी से लेकर तकनीक में शीर्षत्व तक कई मामलों में अपना वर्चस्व स्थापित किया है। रूस वैसे तो अमेरिका और सोवियत संघ के मुकाबले कमजोर है, लेकिन उसे भी उसकी सैन्य ताकत के आधार पर एक मुख्य शक्ति माना जाता है। उसने अपनी सैन्य शक्ति को सीरिया जैसे देशों में तैनात भी किया था। चीन भी निस्संदेह अब एक महान शक्ति है क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था बेहद मजबूत है (हमारी जीडीपी के मुकाबले ६  गुना) और रक्षा मद में उसका खर्च हमारे मुकाबले ४  गुना है। हमे स्वीकारना होगा कि भारत फिलहाल अमेरिका या चीन जैसी आर्थिक ताकत नहीं है। यूँ तो हमारी सेना दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना है लेकिन वह मुख्यतय: रक्षात्मक सेना है, जिसे आज कल के अग्निवीर भौचक कर रहे हैं | भारत की सेना फोकस भारत में घुसपैठ से, खासतौर से कश्मीर में लोहा लेना है |

मूल विषय नागरिक प्रतिष्ठा की स्थापना और सम्मान पर चर्चा   के पहले इस बात को भी पूरा करना जरूरी कि भारत में वैसे ऐसा न करने या करने की कोशिश न करने के हमारे अपने कारण हैं। एक गरीब देश के लिए ऐसा करना उचित भी नहीं होगा कि वह अपने सीमित संसाधनों को सैन्य शक्ति विकसित करने में खर्च करे जोकि पूरी तरह से रक्षा के लिए नहीं है। हालांकि दो तरीकें हैं जिनके जरिए भारत विश्व को प्रभावित कर सकता है। पहली बात तो यह है कि भारत दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला लोकतंत्र है और वह लोकतांत्रिक मूल्य के विस्तार और प्रसार के लिए दूसरे लोकतांत्रिक देशों के साथ हाथ मिला सकता है। दूसरी बात यह है कि एक ताकत बनने वाली शक्ति बनने के लिए इसे चीन की तरह अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना होगा तभी निवेश और व्यापार के जरिए वह दुनिया को प्रभावित कर सकता है।

अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर तो क्या ही कहें, बांग्लादेश तक हमसे प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में आगे निकल गया है। २०१४  में बांग्लादेश भारत से ५० प्रतिशत पीछे था, लेकिन अब आगे निकल चुका है। हमारे आसपास ही देखें तो जर्मनी, जापान, ताइवान और दक्षिण कोरिया ने आर्थिक और तकनीकी तौर पर खुद को विकसित किया है और इसी आधार पर वह बाहरी देशों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। इन सभी देशों को मिलाकर भी भारत इनसे कहीं बड़ा है लेकिन हमारे देश में “नागरिक प्रतिष्ठा की स्थापना और सम्मान”की  कमी है | आम नागरिको से सिर्फ मतदान तक मतलब रखने वाले राजनीतिक दलों को विश्व में मिलते नागरिक प्रतिष्ठा की स्थापना और सम्मान का अध्ययन करना चाहिए | इससे “अग्निपथ” नहीं बनेंगे और भारत वास्तव में संप्रभु होगा |