भोपाल: राज्य के गृह विभाग के अधीन कार्यरत लोक अभियोजन संचालनालय के डायरेक्टर अन्वेष मंगलम ने डीजीपी को पत्र लिख कर कहा है कि कुछ प्रकरणों में यह प्रगट हुआ है कि थाना प्रभारी/विवेचकों द्वारा चालान पेश करने के ही दिन आरोपी को सीधे न्यायालय पहुंचने हेतु बताया जा रहा है और उसी समय थाना का चालान मुंशी हाथों-हाथ डायरी/चालान प्रपत्र, विधिक राय लेने के लिये लाता है। इस परिस्थिति में आरोपी का सामना, सरकारी वकील से होता है। इससे सरकारी वकील का अभियुक्त से अकारण (अवाईडेबल) अवांछनीय सम्पर्क होता है और शिकायतों का अवसर बनता है। इस प्रैक्टिस पर रोक लगाई जाये।
पत्र में डायरेक्टर ने यह भी कहा है कि जिलों के पुलिस अधीक्षक/पुलिस आयुक्तगणों को निर्देश प्रसारित करें कि स्क्रूटिनी हेतु प्रस्ताव/डायरी यथा सम्भव आनलाईन ही आईसीजेएस-इंटर आपरेबल क्रिमिनल जस्टिस पोर्टल पर भेजें जावें।
भौतिक प्रस्ताव/केस डायरी सीलबंद लिफाफे में ही भेजी और प्राप्त की जाना चाहिये। भारसाधक अभियोजक को स्क्रूटनी के लिये न्यूनतम 3 दिन और अधिकतम 7 दिन का समय दिया जाना चाहिये। हाथों हाथ अभिमत की अपेक्षा नहीं की जाना चाहिये। यदि अभियुक्त गिरफतार होकर जेल में है और उसकी इस अवधि के 60/90 दिन हो रहे हैं, तो भी यह विवेचक/थाना प्रभारी/एसडीओपी /पुलिस अधीक्षक का दायित्व है कि यदि उन्होंने न्यायालय में धारा 173 के प्रतिवेदन प्रस्तुत करने से पूर्व या विवेचना के दौरान अभियोजक से अभिमत/स्क्रूटनी कराने का निर्णय लिया है तो उन्हें अभियोजक को अध्ययन एवं टीप तैयार करने हेतु समुचित समय देना चाहिये। यदि कोई आपात स्थिति है तो थाना प्रभारी/वरिष्ठ अधिकारी तदाशय द्वारा रिक्विसीशन (मांग पत्र) संलग्न किया जाना चाहिए।
किन्तु ऐसा यदा-कदा ही होना चाहिये, हमेशा (रुटीन) नहीं। जिला पुलिस अधीक्षक/थाना प्रभारी स्क्रूटनी प्रतिवेदन निर्धारित प्रोफार्मा मे ही लिखित रूप में लेने का आग्रह (इंस्टीट) करें। चूंकि अभियोजन अधिकारियों के पास स्टाफ एवं टायपिंग की सुविधाओं का अभाव है, उनके पास उपयुक्त कार्यालय भवन एवं केस डायरी सुरक्षित रखने की व्यवस्था नहीं है और न ही डाक वाहक/वाहन है, इसलिये डायरी भेजने और समय पर ( 3 या 7 दिन बाद) वापस प्राप्त करने की जिम्मेदारी भी जिला पुलिस/थाना की ही निर्धारित की जाये। कार्य को देखते हुए एक अभियोजक एक सप्ताह में 3-4 प्रकरणों से ज्यादा की स्क्रूटनी/अभिमत देने की स्थिति में होंगे, इसलिये एक साथ बहुत ज्यादा प्रकरण न भेजें जायें।