हाल के दिनों में महसूस किया जा सकता है कि अब माहौल ऐसा बन रहा है, मानो कुछ पश्चिमी देश भारत पर भी शिकंजा कसना चाहते हैं, क्योंकि भारत रूस की खुलकर आलोचना नहीं कर रहा है। कहा जा रहा है कि जर्मनी यूक्रेन पर हमले को लेकर रूस के खिलाफ न बोलने पर भारत को जी 7 की बैठक से दूर रखने पर विचार कर रहा है। यदि ऐसा है तो लाजमी है कि भारत पूरी गंभीरता से ऐसी सूचनाओं या कूटनीति साजिशों पर नजर रखे। 

दरअसल अमेरिका सहित पश्चिम के कुछ देश किसी न किसी बहाने भारत को रूस के खिलाफ खड़ा करने के लिए दुष्प्रेरित कर रहे हैं। ऐसी ही कोशिश अमेरिका ने भी की है और जर्मनी के चंद कूटनीतिज्ञों के दिमाग में भी ऐसा कुछ चल रहा है, तो चौंकना नहीं चाहिए। उल्लेखनीय है कि आगामी 26 से 28 जून तक जर्मनी ग्रुप 7 देशों की बैठक की मेजबानी करने वाला है और भागीदारी की सूची में भारत का भी नाम है। 

क्या जर्मनी इस सूची को अब संशोधित करने वाला है? 

क्या वह भारत के खिलाफ जाएगा? 

क्या उसके पास भारत के खिलाफ जाने का पुख्ता आधार भी है?

ध्यान देने की बात है कि भारत को कटघरे में खड़ा करने के लिए ऐसा ही पुख्ता आधार अमेरिका को खोजने से भी नहीं मिल रहा है। वैसे जर्मनी से यह सूचना भी सामने आ गई है कि भारतीय प्रधानमंत्री को नहीं बुलाने की कोई योजना नहीं है। फिर भी माना जा रहा है कि आगामी तमाम अंतरराष्ट्रीय बैठकों को चंद यूरोपीय देश रूस के खिलाफ इस्तेमाल करने वाले हैं। अतः अगर वह भारत को ऐसी बैठकों में शामिल न करने की रणनीति अपनाएं, तो सावधान रहना चाहिए। भारत को किसी भी रूप में किनारे किए जाने या नजरअंदाज करने की साजिश को नाकाम करते चलना होगा और यह काम भारतीय विदेश मंत्रालय बेहतर ढंग से कर रहा है। 

कल ही विदेश मंत्री जयशंकर ने अमेरिका को मानवाधिकार के मुद्दे पर लगभग फटकारा ही है। जहां तक भारत का सवाल है तो हमारे अपने हित हैं और हम किसी भी विदेशी ताकत या गठजोड़ के सामने झुक नहीं रहे हैं, तो यह हमारी मजबूती का प्रमाण है। 

हम न पहले रूस की साम्राज्यवादी कोशिशों के साथ थे और न हमने यूक्रेन के सत्ता प्रतिष्ठान से युद्ध या हमले के समय समर्थन देने का कोई वादा किया था। 

बड़े अफसोस की बात है, यूक्रेन के राष्ट्रपति खुलकर जिन देशों की आलोचना कर रहे हैं, वही देश भारत पर अपनी खीज निकाल रहे हैं। रूस को रोकने के लिए अभी भी यूरोपीय देश समीकरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

ये देश कई कदम उठा सकते हैं, लेकिन उन्हें अपने निहित स्वार्थ की ज्यादा चिंता है। वे अपनी जरूरतों से समझौता नहीं कर सकते, लेकिन भारत पर समझौते के लिए दबाव डाल रहे हैं। आलम यह लगता है कि दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की दहलीज पर कभी नजर आने लगती है। मगर अनेक पश्चिमी देश आज भी न्यायपूर्ण ढंग से नहीं सोच पा रहे हैं। आतंकवाद, अशिक्षा, स्वास्थ्य या गरीबी के मोर्चे पर भी इन देशों का रुख पक्षपातपूर्ण रहा है। इनके नियम कायदे अपने लिए कुछ होते हैं और दूसरी या तीसरी दुनिया के लिए कुछ और अमेरिका का ही अगर ताजा उदाहरण लें, तो सिखों पर वहां रह रहकर हमले हो रहे हैं, लेकिन अमेरिकी विदेश मंत्री ने भारत में मानवाधिकार पर चिंता का इजहार कर दिया। इसी का जवाब कल जयशंकर ने दिया था। बहरहाल भारत कतई युद्ध के पक्ष में नहीं है, यह बात वह हर मंच पर पूरी साफगोई से रखता आ रहा है। लेकिन हम अपने पुराने तथा आजमाए हुए मित्र रूस के व्यवहार से दुखी हैं, बावजूद रूस से झटके में मुंह मोड़ लेना भी समझदारी नहीं है क्योकि अमेरिका समेत दुनिया के कई देश इस नाजुक समय में आपसी संबंधों को लेकर कुछ देशों के लिये नये व मजबूती  वाले नये समीकरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं| 

अंतरराष्ट्रीय : आशीष दुबे