कांग्रेस में अध्यक्ष पद को लेकर अब इतना तो साफ़ हो चुका है कि पार्टी का नया अध्यक्ष गांधी परिवार से बाहर का व्यक्ति होगा। अब तक की जो तस्वीर सामने आ रही है उसके मुताबिक़ राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को नए कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में गांधी परिवार ने समर्थन दे दिया है। गांधी परिवार द्वारा अध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवार का चयन ही उसके विजयी होने की गारंटी है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या अशोक गहलोत कांग्रेस के डूबती दिख रही नैया को पार लगा सकेंगे?

गहलोत का निसंदेह संता संगठन का लंबा अनुभव है वे गांधी परिवार के विश्वासपात्र भी हैं और सबसे बड़ी बात वे ऑपरेशन लोटस के दौर में राजस्थान में अपनी सरकार को बचाने में कामयाब रहे हैं। मगर क्या इस योग्यता की दम पर गहलोत कांग्रेस कांग्रेस को नई दिशा और उर्जा दे पाएगी इसमें संशय है।

राजस्थान के 2013 के विधानसभा चुनाव जब पांच साल गहलोत मुख्यमंत्री रहकर जनता के बीच पहुंचे थे तो उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा था। इस चुनाव में कांग्रेस 200 में से सिर्फ 21 सीट ही जीत सकी थी। वहीं मुख्यमंत्री रहते वे बीते लोकसभा चुनाव में अपने बेटे वैभव गहलोत को भी चुनाव नहीं जिता पाए थे। यहां तक कि पूरे राजस्थान में कांग्रेस खाता तक नहीं खोल पाई थी।  

कांग्रेस की वर्तमान में सबसे बुरी हालत उत्तर भारत में ही है। यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू अब भी सिर चढकर बोल रहा है। ऐसे में जादूगर कहे जाने वाले गहलोत अपनी संवाद शैली या संगठन क्षमता से कोई जादूगरी दिखा पाएंगे यह उनके व्यक्तित्व और उम्र को देख अभी तो बेहद मुश्किल दिखता है। दक्षिण भारत में तो उनका वैसे भी कोई आधार नहीं।  

फिलहाल तो गहलोत के अध्यक्ष बनने पर कांग्रेस को राजस्थान में ही बड़े सियासी संकट का सामना करना पडेगा। जिस तरह गहलोत मुख्यमंत्री पद का मोह दिखा रहे हैं उसे दखते हुए कांग्रेस के लिए सचिन पायलट को साधना ही मुश्किल होगा और अगर गहलोत-सचिन की तकरार और तीखी हुई तो कांग्रेस के हाथ जो दो राज्य बचे हैं उनमे से भी वो एक से हाथ धो बैठेगी इतना तय माना जा रहा है।