भोपाल: यह सवाल सुप्रीम कोर्ट के एक निर्देश से खड़ा हो रहा है. भारत सरकार ने वन विभाग को एक पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन कराने की हिदायत दी है. सुप्रीम कोर्ट ने 2 जून 22 को निर्देश दिए हैं कि नेशनल पार्क और सेंचुरियों के इको सेंसटिव जोन (ESZ) का दायरा एक किलोमीटर होना चाहिए.

शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया है कि ईको सेंसेटिव जोन में कोई भी स्थाई निर्माण कार्य नहीं होगा. यदि शीर्ष अदालत के निर्देशानुसार वन विहार का इको सेंसटिव जोन का दायरा 1 किलोमीटर तक बढ़ाया गया तो राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, मुख्यमंत्री निवास, पुलिस बटालियन और जहांनुमा होटल इसके दायरे में आ जाएंगे और यहां कोई भी स्थाई निर्माण कार्य नहीं हो सकेंगे.

भारत सरकार के एक पत्र से फॉरेस्ट के आला अफसरों के हाथ-पैर फूल रहे हैं. भारत सरकार ने यह पत्र सीधे पीसीसीएफ को लिखा है. पत्र में लिखा गया है कि शीर्ष अदालत के निर्देश का पालन कराया जाए. पत्र मिलने के बाद पीसीसीएफ वाइल्डलाइफ जेएस चौहान ने प्रमुख सचिव वन अशोक वर्णवाल को पत्र लिखकर प्रमुख सचिव पर्यावरण को अवगत कराने और नीतिगत निर्णय लिए जाने का अनुरोध किया है.  

वर्तमान में वन विहार नेशनल पार्क का इको सेंसटिव जोन का दायरा 100 मीटर है. यह निर्धारण भी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय और मुख्यमंत्री निवास को मद्देनजर किया गया था. विधि विशेषज्ञों की माने तो शीर्ष अदालत के निर्देश से राहत पाने के लिए राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगानी होगी. साथ ही शीर्ष अदालत को अवगत कराना होगा कि मध्यप्रदेश में सभी नेशनल पार्क एवं सेंचुरियों के लिए इको सेंसटिव जोन का निर्धारण कर दिया गया है.

क्या है सुप्रीम के निर्देश-

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के भीतर खनन की अनुमति नहीं दी जाएगी. इसके अलावा शीर्ष अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि संरक्षित जंगल के इको सेंसटिव जोन (ESZ) का दायरा एक किलोमीटर होना चाहिए.

शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया है कि ईको सेंसेटिव जोन में कोई भी स्थाई निर्माण कार्य नहीं होगा और साथ ही कहा है कि नेशनल वाइल्ड लाइफ सेंचुरी और नैशनल पार्क में कोई खनन कार्य नहीं होगा क्योंकि इसकी इजाजत नहीं है. यह आदेश जस्टिस एल नागेश्वर राव, बीआर गवई और अनिरुद्ध बोस की बेंच ने पारित की है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि मौजूदा इको सेंसटिव जोन (ESZ) एक किलोमीटर बफर जोन से आगे जाता है या यदि कोई वैधानिक साधन उच्च सीमा निर्धारित करता है तो ऐसी विस्तारित सीमा मान्य होगी.

3 महीने में प्रस्तुत करना होगी शीर्ष अदालत को रिपोर्ट-

गौरतलब है कि प्रत्येक राज्य के मुख्य वन संरक्षक को (ESZ) में विधमान संरचनाओं की एक सूची बनाने और तीन महीने की अवधि के भीतर अदालत को रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है. प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक को भी ईएसजेड के भीतर विद्यमान संरचनाओं की एक सूची बनाने और 3 महीने में शीर्ष अदालत को रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया. जस्टिस एल नागेश्वर राव, बिहार गवाही और अनुज बोस की तीन न्यायाधीशों की बेंच ने 60 पृष्ठ के फैसले में इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे खनन और अन्य गतिविधियों से देश के प्राकृतिक संशोधनों को वर्षों से तबाह किया गया है.

इनका कहना है-

 "सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के पालन कराने संबंधित पत्र मिला है. इस संबंध में भारत सरकार से मार्गदर्शन मांगा है."

"अशोक वर्णवाल अपर प्रमुख सचिव वन"