भोपाल। मप्र कांग्रेस में राज्यसभा की एक सीट को लेकर घमासान शुरू हो गया है। मौजूदा राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है और जून में चुनाव होंगे, लेकिन तन्खा के लिये कभी पूरा जोर लगाने वाला कांग्रेस का कमोबेश हर धडा उन्ही के नाम पर अनमना है। पीसीसी के हरकमरे में यही चर्चा है। माना जा रहा है कि कुछ वरिष्ठ नेता और कुछ नये दावेदार संगठन के प्रति अपनी निष्ठा जताते हुए संगठन कोटे' से राज्यसभा जाने के लिये 10 जनपथ के दरवाजे पर दस्तक भी देने वाले हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात का समय भी मांगा जाने लगा है। यह नया घटनाक्रम विवेक तन्खा के सिर्फ असंतुष्ट नेताओं वाले जी- 23 ग्रुप में शामिल होने की वजह से ही नहीं उपजा है, बल्कि कई पुराने दावेदारों की दुरभिसंधियां भी इसमें शामिल मानी जा रही है।

जानकार सूत्रों का कहना है कि विवेक तन्खा की हाल में सोनिया गांधी से मुलाकात की खबरों के बाद नये-पुराने दावेदार सक्रिय है। हालांकि दिग्विजय सिंह और कमलनाथ को तन्खा का पैरोकार माना जाता है लेकिन संगठन से उठ रहे सुरों के चलते दोनों को इस बार परेशानी हो सकती है। तन्खा चूंकि मशहूर अधिवक्ता भी हैं और कांग्रेस हाइकमान के खिलाफ सीधा मोर्चा खोले हुए अधिवक्ता व सांसद कपिल सिब्बल के भी करीब माने जाते हैं इसलिये कांग्रेस के भीतर उनकी धाक स्वीकार्यता पहले जैसी नहीं मानी जा रही है। ज्ञात हो तन्खा को दो बार राज्यसभा टिकट और दो बार लोकसभा का टिकट दिया गया एक राज्यसभा जीत उनके खाते में है। अक्सर खामोश रहने वाले कांग्रेस के महामंत्री राजीव सिंह आश्चर्यजनक रूप से मुखर हैं और साफ कहते हैं कि संगठन में काम करने वाले नेताओं को भी पुरस्कार मिलना ही चाहिये, राज्यसभा में ऐसे नेता को भेजने •से संगठन का सम्मान बढ़ेगा। वे कहते हैं कि उन्होंने पार्टी अध्यक्ष से मिलने का भी समय मांगा है। उधर तन्खा ने इस वक्त खामोशी ओढ रखी है। कमलनाथ लंबी विदेश यात्रा से लौट आये हैं और अब इसे लेकर कई पदाधिकारी उन तक भी अपना पक्ष पहुंचाने की तैयारी किये बैठे हैं।

कमलनाथ के मीडिया कॉर्डिनेटर नरेन्द्र सलूजा का कहना है कि सभी को अपनी बात कहने व दावेदारी का हक है। इस संबंध में फैसला सर्वसम्मति से ही होगा। अभी कोई विचार विमर्श नहीं हुआ।

दर्द : डेढ़ दशक से सिर्फ संघर्ष

दरअसल, कांग्रेस में लंबे समय से कई नेता अपने कामकाज और वरिष्ठता के चलते 'राजप्रसाद' के दावेदार हैं। ऐसे कई नेता हैं जिन्होंने बीते पंद्रह साल लगातार भाजपा के शासन में संघर्ष किया लेकिन कांग्रेस की पंद्रह महीने की सरकार में भी उन्हें इसका पुरस्कार नहीं मिला। लिहाजा 'कुछ मिलने की उम्मीद में करीब एक दर्जन पूर्व या मौजूदा पदाधिकारी सक्रिय हैं। इनके अलावा कम से कम चार वरिष्ठ नेता भी स्वाभाविक दावेदारमाने जा रहे हैं लेकिन एक सूत्र का कहना है कि यदि तन्खा के नाम पर 'परिस्थिति' बदली भी, तो किसी अन्य राज्य से आने वाले 'पैराशूट उम्मीदवार का अंदेशा भी रहेगा।

58 का आंकड़ा

कांग्रेस को राज्यसभा में उम्मीदवार जिताने के लिये 58 विधायकों के वोट की दरकार है, जबकि उसके पास इससे करीब चालीस वोट ज्यादा हैं। उधर भाजपा को अपने दो उम्मीदवार राज्यसभा में भेजने के लिये पर्याप्त वोटों से भी 13 वोट ज्यादा हैं।