राष्ट्रपति पद के लिये संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार व पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा के लिए यह चुनाव काफी कठिन होता जा रहा है, ठीक उसी तरह जैसे करीब पचास साल पहले उन्होंने खुद के लिए एक 'चुनाव' किया था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उन दिनों यशवंत सिन्हा पटना यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे। वे दिल को संभाल नहीं पाए और इंग्लिश लिटरेचर से एमए कर रहीं मीनाक्षी को दिल दे बैठे। वे मीनाक्षी को जीवनसंगिनी भी बनाना चाहते थे।
मीनाक्षी खूबसूरत थीं, पढाई में भी अव्वल थीं। युवा यशवंत को लगा कि इससे बेहतर और क्या हो सकता है। मगर जब उन्होंने प्रपोज किया तो मीनाक्षी ने उन्हे कुछ कहा यशवंत, शादी की बात तो हम सोच भी नहीं सकते। हम अच्छे दोस्त हैं और आगे भी अच्छे दोस्त बने रहेंगे।'
दरअसल वह जमीनी सच्चाइयों के मामले में यशवंत के मुकाबले ज्यादा समझदार थीं। उन्होंने यशवंत को समझाया- 'देखो, अभी तो हम लोग पढ़ रहे हैं, आगे का कुछ भी निश्चित नहीं है। ऐसे में शादी पर कोई फैसला कैसे ले सकते हैं? दूसरी बात यह कि मैं बंगाली हूं। हो सकता है, दोनों का पखिार इस रिश्ते को कबूल न करे।लिहाजा ऐसा फैसला न करें कि बाद में मुश्किल बने।' यशवंत इतना ही कह सके- ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्जी।
अपनी शादी पर बुलाया
मीनाक्षी अपने दोस्ती के वादे पर कायम रहीं। कुछ वर्ष बाद मीनाक्षी की शादी स्वजातीय सुजीत बनर्जी से तय हुई। सुजीत पटना कॉलेज में लेक्चर थे और संयोग यह कि यशवंत सिन्हा के सीनियर भी थे। उस वक्त तक खुद यशवंत सिन्हा भी लेक्चर हो चुके थे। मीनाक्षी ने अपनी शादी का निमंत्रण कार्ड उन्हें अपनी बहन के हाथ भेजा और आने का अनुरोध भी कराया। यशवंत सिन्हा मीनाक्षी की शादी में शामिल हुए भी।
यशवंत हो गए स्तब्ध
दिन गुजरे और यशवंत का भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयन हुआ तो मीनाक्षी का बधाई संदेश उन्हें मिला। दोनों की जिंदगी ने अलग पटरियों पर रफ्तार पकड़ ली, बातचीत का सिलसिला थमने लगा। मीनाक्षी साहित्य की दुनिया में अपनी पहचान बना चुकी थी। मगर एक रोज किसी कॉमन दोस्त के जरिए यशवंत सिन्हा को जानकारी मिली कि मीनाक्षी के पति सुजीत का निधन हो गया है। वह मीनाक्षी को सांत्वना देने के लिए उनके घर गए। लेकिन पति की मौत के बाद मीनाक्षी भी बहुत दिन जी नहीं पाई। फिर एक रोज यशवंत सिन्हा को उनकी मौत की भी खबर मिली। और यह एक ऐसी खबर थी, जिसने उन्हें कुछ देर के लिए स्तब्ध कर दिया..।