डर क्या है, डर क्यों लगता है, डर से कैसे मुक्त हों...

इस दुनिया में ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जिसको डर ना लगता हो, बाहर से कोई व्यक्ति बहुत बहादुर नजर आता है लेकिन वास्तव में वो भी अंदर से डरा हुआ होता है| यह डर तब खतरनाक हो जाता है जब हम जरूरत से ज्यादा डरने लगते हैं, फिर ये हमारे ऊपर हावी हो जाता है| डर के हावी होने से हमारी सहज स्थिति नहीं रह जाती, जीना बड़ा मुश्किल हो जाता है| 

जीवन में मनुष्य की तलाश शांति, सहजता, प्रसन्नता की तलाश है| कोई न कोई ऐसा मौका आ जाता है जब हम अंदर के डर जाते हैं| कई लोग डर का व्यापार करते हैं, कई इस व्यापार में सहभागी बनते हैं| मानव जाति डर के साथ जीने को मजबूर है, यदि हम डर से हार गए तो डर हमारी जिंदगी खराब कर देगा|

हम डर पर काबू कैसे पाएं, डर से कैसे जीतें, डर आखिर है क्या..

क्या आप यकीन करेंगे “डर” हमारे जीवन की स्वाभाविक स्थिति है| जैसे निडरता है वैसे ही डर है| जितनी मात्रा में हमारे अंदर साहस मौजूद है उतनी ही मात्रा में डर मौजूद है| 

1. डर नैसर्गिक रूप से हमें मिला हुआ है| 

2. डर बहुत जरूरी है हमारी लाइफ के लिए|

3. डर के कारण हम अच्छी जीवन शैली अपनाते हैं, डर के कारण हम अनुशासित रहते हैं|

4. डर ही तो हमें जीवन जीना सिखाता है|

5. डर हमें अनुशासन में रहने की प्रेरणा देता है|

6. डर के कारण ही हम धार्मिक होते हैं|

7. डर के कारण ही हम आध्यात्मिक होते हैं|

आज मानव जाति ने इतनी तरक्की की है तो उसके पीछे डर की सबसे बड़ी भूमिका है| हमारी तरक्की, सभ्यता और हमारे संस्कारों में, डर भी छिपा हुआ है| जब डर निश्चित मात्रा में हमारे अंदर होता है तो वो प्रेरणा का काम करता है| वो हमारे जीवन को सही ढंग से चलाने का काम करता है|

आज समाज में लोग यदि डर से मुक्त हो जाएं तो समाज अव्यवस्थित हो जाए, समाज की व्यवस्था बिगड़ जाए, सिस्टम तहस नहस हो जाए|

शासन-प्रशासन चलता है क्योंकि लोगों के अंदर डर है| पुलिस का जोर चलता है क्योंकि लोगों के अंदर डर है| इस दुनिया में जो भी प्राणी मौजूद है उसके अंदर डर है|

शेर जंगल का राजा कहा जाता है लेकिन उसके अंदर भी डर है, यदि शेर को डर नहीं होता तो फिर होता? वो आराजक हो जाता, निरंकुश हो जाता|

मानव के अंदर डर नहीं होता तो मानव - मानव नहीं बन पाता| डर नैसर्गिक है एक निश्चित मात्रा में, जब वो प्रेरणा का काम करे, जब हमें जीवन के सही मार्ग पर ले जाने में अहम भूमिका निभाए|

जब डर सीमा से बाहर हो जाता है तो वो ख़तरनाक हो जाता है| तब हमें सजग हो जाना चाहिए और हमें देखना चाहिए कि इसकी मात्रा क्यों बढ़ रही है? क्या इसके पीछे वो संदेश हैं जिन्हें हम लगातार अपने अवचेतन में एंट्री करने की अनुमति दे रहे हैं| वो संदेश जो लगातार नेगेटिविटी फैलाते हैं तब उन संदेशों से दूरी बनाना जरूरी है| डर का व्यापार चारों तरफ है|  धार्मिक अंधविश्वास के पीछे भी यह डर ही है|

हमें कई बार मैसेज भेजे जाते हैं इस मैसेज को इतनी फॉरवर्ड करो नहीं तो आपका ये हो जाएगा, वो हो जाएगा और लोग डर से फॉरवर्ड करते रहते हैं|  जो भी डरावनी चीज  इनके  पास आती है ये स्प्रेड कर देते हैं ऐसे लोगों से सावधान रहिये| 

यदि आपके पास कोई मैसेज आता है जो आपको डराता है तो उसे फॉरवर्ड मत कीजिए|

हम देखते हैं कि डरावनी तस्वीरें प्रकाशित की जाती हैं, डरावने दृश्य दिखाए जाते हैं| इतने लोग मर रहे हैं, इतने लोगों की चिताएं जल रही है, इतने लोग एक साथ चले गए| जीवन और मरण ईश्वर के हाथ में है जब जिसकी मौत आती है और चला जाता है|

हम खुद को अनुशासित रखें, नियमित करें, अच्छा भोजन करें और स्वाभाविक, अनुशासित रहते हुए जितना नैसर्गिक हो उतना रहने कोशिश करें| 

यह जीवन नदी की तरह है हमे जगत में प्रवाहित होते रहना है| नदी की राह में कई बार अवरोध आते हैं, कई बार बाढ़ आती है लेकिन उसका प्रवाह रुकता नहीं, रुकता है तो वो नई राह बना लेती है, ऐसा ही जीवन हो| 

सुख-दुख दोनों भाई-बहन हैं, एक दूसरे के साथ चलते हैं, एक दिखाई देता है लेकिन दूसरा उसके साथ मौजूद रहता है|

जड़ पर काम कीजिए, पत्तों को सींचने से कोई फायदा नहीं होने वाला| 

जड़ पर हम कैसे काम करेंगे...

हम अपने डर की जड़ों को पहचानने की कोशिश करेंगे, कौन सी जगह है जहां पर डर बैठ गया है? डर रूपी गंदगी जिन जड़ों में जगह बना चुकी है, जहां कीड़ा लग गया है उन जड़ों को साफ करना है|

डर क्यों पनपता है...

कारण नकारात्मक संदेश हो सकते हैं| हमारे आसपास के नकारात्मक लोग हो  सकते हैं| टेलीविजन, इंटरनेट हो सकता है| Facebook हो सकता है|

Facebook  पर हम जब भी डरावने वीडियो देखेंगे तो एक साथ कई और वीडियो “सजेशन” में हमारे पास आ जाएंगे क्योंकि इंटरनेट एक ऐसा संसार है जो हमारी रुचियों को देखता है| आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पकड़ लेती है कि हमें डरावनी चीजों से प्रेम है, तो वो उसी तरह की चीजें प्रस्तुत करती है| 

एक बार इस मनोविज्ञान को समझ लिया तो फिर कितनी ही डरावनी चीजें आ जाएं जीवन को प्रभावित नहीं कर सकती|

श्मशान घाट पर जो अंतिम संस्कार में मदद करते हैं उन्हें डेड बॉडी से डर नहीं लगता क्योंकि वो उनके साथ स्वाभाविक रूप से जीना सीख लेते हैं| डॉक्टर अनेक रोगियों को देखता है उसे रोग से डर नहीं लगता, उसके पास 1000 प्रकार के रोगी आते हैं लेकिन वो रोग शायद ही डॉक्टर को लगते हैं| क्योंकि वो रोग के मनोविज्ञान को समझ लेता है|

ऐसे अनेक प्रोफेशन है जो बहुत ही खतरनाक हैं| जो परमपिता परमात्मा के हर निर्णय को स्वीकार करता है, “जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए” पर यकीन रखता है, उससे अनैसर्गिक डर दूरी बना लेता है|

जब हम ईश्वर के प्रति आशंकित होते हैं, उसके निर्णयों के प्रति आशंकित होते हैं, प्रकृति के विधान पर अविश्वास करते हैं, तब तक डर हमारे ऊपर हावी हो जाता है|

जो भी हमारे साथ घटित होता है कहीं ना कहीं वो हमारे प्रारब्ध का परिणाम होता है- इतना विश्वास भी हमे सहज बना देता है|